शनिवार, 18 जनवरी 2020

ठाकुर मर्दन सिंह की दुहाई

ग्वालियर के महाराज सिंधिया द्वारा मर्दन सिंह जी की दुहाई दे बकरे का शीश काटना।



द्वारकाधीश भगवान श्री कृष्ण की 155वी पीढ़ीयों में पुलईया राजघराने में जन्मे ठाकुर मर्दन सिंह जी कि पूरे क्षेत्र में बढ़ती हुई प्रतिष्ठा से आसपास के कई राजघराने मैं जलन होने लगी ।जो कि हमेशा से ही क्षत्रियों में अबगुण विद्यमान रहा और जिसका दंश पूरे देश ने झेला ।
महाराजा सिंधिया के दरबार में भी मर्दन सिंह जी के शौर्य और उनके देवत्व पूर्ण कार्यों की प्रशंसा बढ़ने लगी । जिससे तिलमिला कर एक दिन महाराज सिंधिया ने दरबार में कहा। क्या वह इतना महान व्यक्ति है जिसमें आप लोग देवत्व की बात करते हैं ।
 किसी ने कहा हां ऐसा ही है हमने ऐसा ही सुना है ।अहीरवाड़ा के लोग ऐसे ही बात करते है। तब राजा सिंधिया ने कहा । अच्छा लो आज मैं उसके नाम का बकरा काट देता हूं देखता हूं कितना सत्य है उसमें ।
महाराज  सिंधिया ने बकरे का सिर कटवाया उसी समय कहीं से कुत्ता दौड़ता हुआ आया  और उस कटे हुए शीश को लेकर कई दिनों की यात्रा कर पट्टन पहुंच गया । एक सैन्य दस्ता भी उस कुत्ते के पीछे पीछे पट्टन चला आया । जब मर्दन सिंह जी ने देखा तो उन्होंने कहा ठीक है महाराज का बुलावा आ गया चलिए  महाराज से मिलाते हैं और उस कुत्ते के साथ ही जिसके पीछे ग्वालियर का एक सैन्य दस्ता भी चल रहा था।  ठाकुर मर्दन सिंह जी ग्वालियर के दरबार में बकरे के शीश लिए कुत्ते के साथ उपस्थित हो गए और ठाकुर मर्दन सिंह जी ने  सहज भाव से  कहा कि महाराज आप महाराज है और मैं एक छोटी सी जागीर का सेवक हूं । आपके सामने मेरा क्या मान । व्यर्थ ही आपने इस बेजुबान का वध कर दिया । ग्वालियर के महाराज सिंधिया  ने इतने प्रेम भरे और विनीत वचन सुन ठाकुर मर्दन सिंह जी को अपने गले से लगा लिया और कहा मुझे क्षमा कर दीजिए ।

जय द्वारिकाधीश।