मंगलवार, 9 नवंबर 2021

वीरांगना गंगा जमना

 Yadav veerangana Ganga jamna nekan sironj mp




यादव बेटियों ने हिंदुत्व की शान के खातिर कटा दिये अपने शीश

ग्राम :- नैकान, सिरोंज   जिला विदिशा

 बलिदानी गंगा - जमना

 कटे शीश, सजे थालों में।

 गाय किस्से राई फगवारो में ।।

यादव जागीरदार ने अपनी लड़कियों के शीश काट दिए लेकिन अपने हिंदू रक्त को न लज्जित होने दिया ।

 विदिशा जिले के सिरोंज तहसील के ग्राम नैकान  जो किसी समय टोंक नवाब के अधीनस्थ हुआ करता था। हिंदू शादी में फूट के कारण टोक नवाब सिरोंज तक सीमा बढ़ाने में सफल रहा अपने लोगों की रक्षा के लिए कई देशभक्त स्वाभिमानी जमींदारों को नवाब के अधीनता स्वीकार करनी पड़ गई।

 एक समय का वाक्या है सिरोंज नवाब शिकार खेलता हुआ अपनी सेना सहित ग्राम नेकान पहुंच गया । वह पहले भी अक्सर शिकार के लिए आया करता था और नैकान के यदुवंशी जागीरदार श्री दंगल सिंह हिंदुत्व के अतिथि देवो भव: की परंपरा का निर्वाह करते हुऐ अपने सामर्थ्य अनुसार सत्कार किया। उसी समय नवाब की नजर जमीदार की दो कन्याऔं पर पड़ गई क्योंकि वह बहुत ही सुंदर थी जिनके खाए हुए पान भी उनके गालों से नजर आया करते थे इतनी सुंदर लड़कियों को देखते हुए नवाब जमीदार से कहने लगा हम आपकी लड़कियों से निकाह करना चाहते हैं आपकी दोनों लड़कियां तो हमारे लायक हैं इतना सुनते ही बरगद के नीचे दरबार में बैठे सभी यदुवंशियों ने अपनी तलवार खींच ली । गंभीर स्वाभाव के जमीदार ने सबको ठहराते हुए कहा हम आपको कुछ देर में जवाब देंगे। वह सभा से उठकर अपने घर आए और अपनी दोनों कन्याओं से पूछा कि तुम मेरे आधीन हो या नवाब के। कन्याओं ने कहा पिता महाराज हमारे शरीर की बूंद बूंद आपकी दी हुई है आप जैसा चाहेंगे वही होगा। जमीदार साहब जानते थे कि युद्ध हुआ तो भी  हार हमारी निश्चित है और हार के बाद भी यह पापी दोनों कन्याओं को लेकर चला जाएगा और इससे यदुवंशी हिंदू रक्त का भी अपमान होगा हमारी संस्कृति का अपमान होगा जिसको हम सदियों से सवारते सजाते आ रहे हैं यह सब विचार करने के बाद जमीदार साहब ने अपनी दोनों कन्याओं से कहा कि आप सोलह सिंगार कर कर आ जाऔ। दोनों ने सोलह सिंगार करके जमीदार साहब के सामने उपस्थित हुई जमीदार साहब ने कहा पुत्री आज मान सम्मान के लिए बलिदान का दिन है अपने पुरखों के मान पर आंच न आए इसलिए आज तुम्हें बलिदान देना पड़ेगा। पिताजी हमारा यह शरीर आप का दिया हुआ है आप जैसा उचित हो वैसा करें। तब जागीरदार दंगरसिंह ने अपनी दोनों लड़कियों के शीश काट दिये और उन्हें एक थाल में सजाकर नवाव के पास ले चले।ताकि नवाव का भी शीश काट सकें। जमीदार साहब लड़कियों के शीश लेकर घर से बाहर निकले । उन शीशो को देख यदुवंशी सरदारों में क्रोध की आग फैल गई और सारे के सारे  जय दादा कृष्ण हर हर महादेव के नारे लगाते हुए नवाब की सेना पर टूट पड़े किंतु में कपटी नवाब वहां से बच निकला ।

 धन्य है वह पिता जिसने अपनी धर्म रक्षा के लिए अपनी पुत्रियों का शीश काटा 

 धन्य है वे कन्याये जिन्होंने अपने कुटुंब की मर्यादा के लिए प्रसन्नता और गर्व से अपने प्राण न्योछावर कर दिए ।

धन्य है भारत भूमी

 धन्य है सनातन संस्कृति 

धन्य है यदुवंश

 यत्र नारी पूज्यंते रमंते तत्र देवता

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

 ठाकुर पूरणमल सिंह यदुवंशी










अहिरवाड़ा मध्य भारत या आधुनिक मध्य प्रदेश में पार्वती और बेतवा नदियों के बीच स्थित एक ऐतिहासिक विशाल क्षेत्र है।

अहिरवाड़ा एक राजशाही राज्य था भगवान श्री कृष्ण के वंशज यदुवंशी अहीर क्षत्रिय राजाओं द्वारा शासित जो आज के भिलसा और झांसी शहरों के बीच स्थित था। इस राजवंश से जुड़े सिक्के तथा खण्डित अवस्था में शाही दुर्ग, महल की इमारते और मन्दिर आज भी मौजूद हैं।

रणधुरंधर राजा ठाकुर पूरण सिंह यदुवंशी इस राजवंश तथा राज्य के आखिरी शासक थे और मुस्लिम आक्रांता औरंगज़ेब के समकालीन थे ।

1700 में जब मालवा हिंदुआ सूर्य, अहीरवाड़ा नरेश यदुकुल अवतंस राजा ठाकुर पूरणमल सिंह राजगद्दी पर नशीन हुए तब उस समय क्रूर औरंगजेब द्वारा हिंदुओं पर सख्ती और ज़ुल्म बढ़ने लगे थे।

शिवाजी महाराज की तरह ही निडर ठाकुर पूरनमल सिंह ने औरंगजेब के आगे झुकना अपनी शान में हिमाकत और क्षत्रिय मर्यादा के विरुद्ध समझा इसीलिए औरंगजेब के ख़िलाफ़ बगावत का बिगुल फूंक दिया।

आये दिन अहीरवाड़ा के वीर हिंदु क्षत्रिय यदुवंशी अहीर, ब्राह्मण तथा रघुवंशी मुग़लिया फौज़ पर अपने राजा पूरणमल सिंह के नेतृत्व में हमला कर लूट खसूट करते थे।

औरंगजेब की जीवनी में उल्लेख है कि अहीरवाड़ा के वीरों से परेशान हो औरंगजेब ने अहीरवाड़ा से उठते विद्रोह को खत्म करने के लिए अपने ग़ुलाम तथा खिंची वंश के राजा दिलीप के साथ लगभग 50,000 की सँख्या में मुग़ल फौज़ को भेजा ।।

इतिहास गवाह रहा है कि हिंद के क्षत्रियों में शुरू से एकता का अभाव रहा है तथा इसी बात का फ़ायदा एक बार उठा औरंगजेब ने अहीरवाड़ा नरेश ठाकुर पूरनमल सिंह अहीर के कातर दुश्मन खिंची वंशी दिलीप को मोहरा बना विशाल मुग़ल सेना भेजी युद्ध हेतु।

दोनों तरफ़ की सेना के मध्य भयंकर युद्ध भी होता है लेकिन अंत मे गद्दार राजा दिलीप की गद्दारी के कारण राजा पूरनमल सिंह और उनकी अहीर सेना हार जाती है  तथा अहीरवाड़ा का विशाल राज्य औरंगजेब अपने पालतू दिलीप को दे देता है ताकि भविष्य में हिंदुओं के तरफ़ से इस इलाके में कोई विद्रोह न हो।

1703 के बाद एक बार फ़िर राजा पूरनमलसिंह का वर्चस्व बढ़ता है और सूबे के वीर क्षत्रिय अहीरों, अफ़ग़ान पठानों, गरासियों, ब्राह्मणों की सेना के मदद से वे इलाकों को जीतते हुए औरंगजेब को चुनौती देते हुए एक पत्र में ये लिखवा भेजते हैं कि  " औरंगजेब हमने अपने बाप दादाओ से ये राज्य पाया था। ये कोई तुमहारे बाप दादा की जागीर नही। हम यहाँ के बेताज बादशाह है और ये तुम्हारी पहुँच के बाहर। जब तक जीयेंगे आज़ाद जीयेंगे "।

1714 में फ़िर से औरंगजेब ने विद्रोह दबाने हेतु अपने वफ़ादार तथा क्षत्रिय कुल पर कलंक कहे जाने वाले जयपुर घराने के राजा जयसिंह के संग हज़ारो की तादाद में मुग़ल फौज़ भेजकर अहीरवाड़ा से चन्द्रवंशी क्षत्रीय अहीर शासको की मिलकियत खत्म करने का हुक्म दिया।

जयसिंह मुग़ल सेना लेकर चढ़ाई करदेता है।

भीषण युद्ध होता है लेकिन एक बार फ़िर जांबाज़ ठाकुर पूरनमल सिंह और उनकी सेना मुग़लिया सेना और जयसिंह को मार खदेड़ते हैं तथा सिरोंज पर नियंत्रण स्थापित कर लेते हैं।

 अहीर देश (अहिरवाड़ा) अपने क्षत्रप ठाकुर पुरनमल के नेत्रत्व मेंमुग़लो को सबक सिखाने के लिए सिरोंज से कालाबाग के लिए सड़कों को बंद कर दिया और रानोड और इंदौर के अपने गढ़ों से मुग़ल बादशाहत को परेशान करना जारी रखा।


राजा जय सिंह एक बार फिर अप्रैल 1715  में  सिरोंज पहुँच अफगान सेना को पराजित करता है।

परंतु जय सिंह की ये जीत  ज्यादा दिन तक नहीं टिक पायी और नवंबर 1715 में ठाकुर पूरनमल सिंह जी ने मालपुर में नए सिरे से लूट-पाट शुरू कर दी।

 यदुवंशी अहीर, अफगानी पठान, ब्राह्मण, गरासिया, भील तथा अन्य हिंदू राजशाही मालवा में चारों ओर से विद्रोह हेतु खड़े हो गए अपने क्षत्रप ठाकुर पूरनमल सिंह के नेतृत्व में।

 स्थिति को नियंत्रित करने की मुग़ल सरकार की हर कोशिश नाकाम रही और राजा ठाकुर पूरनमल सिंह ने जीतेजी कभी औरंगजेब के आगे सर नही झुकाया।
अहीरवाड़ा नरेश ठाकुर पूरणमल सिंह परिवार सहित अपनी मातृभूमि की रक्षा करते करते वीरगति को प्राप्त हो गए ।

जिस तरह चित्तौड के महाराणा प्रताप ने जीवित रहते कभी भी मुगलों के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया । उसी प्रकार अहीरवाड़ा में ठाकुर पूरणमल सिंह जी ने भी जीवन रहते कभी भी मुगलों के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया और युद्ध करते-करते अपने देश अहीरवाड़ा की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों को निछावर कर दिया।



मालवा रत्न,  हिंदुआ सूर्य अहीरवाडा नरेश ठाकुर पूरण सिंह को शत शत नमन।

बुधवार, 29 जुलाई 2020

ठाकुर मर्दनसिंह जी का तप








विदिशा मुख्यालय  के पास स्थित तिगरा गांव के विश्वकर्मा जी लोहार एक बार पट्टन गए। उन्होंने पट्टन में जाकर अपनी भट्टी लगा दी।  उसमें कोयला और लकडिया डालना शुरू कर दी। इसी समय मर्दनसिंह जी वहां से गुजर रहे थे। उन्होंने पूछा यह कौन है । आदमीयों ने बताया यह टिगरावाले लौहार है जो बहुत ही अच्छी कारीगरी से औजारों का निर्माण कर देते है। मर्दनसिंह जी ने कहा, ठीक है हम देखते हैं कैसे औजार, हथियार बनाते हैं और ठाकुर साहब जहां पर लोहार अपनी भट्टी लगाए हुए थे वही जाकर बैठ गए । लोहार ने अपना जितना भी ईंधन था धीरे-धीरे कर सारा भट्टी में लगा दिया लेकिन उस भट्टी में ताप नहीं आ रहा था । भट्टी में पढ़ा हुआ लोहे गर्म नहीं हो रहा था।  लौहार परेशान हो गया उसने सोचा आज न जाने क्या हो रहा है। आज ही ठाकुर साहब मेरे पास मेरा काम देखने के लिए बैठे हैं और आज ही यह भट्टी लोहा गरम नहीं कर रही है। फिर उसने मर्दन सिंह जी के सामने हाथ जोड़कर कहा हुकुम साहब आज न जाने क्यों मेरी भट्टी में पड़ा हुआ लोहा गरम नहीं हो रहा । मुझे क्षमा कर दीजिए जो मैं आज आपको अपनी प्रतिभा नहीं देखा सका ।
 मर्दन सिंह जी कहा, कोई बात नहीं है। फिर कभी देख लेंगे । यह कह उठ कर चले गए। जैसे ही वे भट्टी से दूर गए । एकदम से भट्टी लाल हो गई  , उसमें पढ़ा हुआ लोहा भी लाल हो गया । लोहार समझ गया यह मर्दन सिंह जी के तप का प्रभाव था कि जब तक वे यहां थे भट्टी का ताप मंदा पड़ रहा। इसीलिए भट्टी में पड़ा हुआ लोहा गरम नहीं हो रहा था । यह कहानी आज भी आसपास के कई गांवों में बताई जाती है सुनाई जाती।

जशमन विश्वकर्मा
टिगरा, विदिशा

ठकुराईन का प्रण

ठकुराइन के प्राण से हुई धुआंधार बारिश










 एक बार पट्टन जागीर में भारी सूखा पड़ा। लोग पानी के लिए तरसने लगे। कुछ लोगों ने त्रेता युग की कथा याद कर के जनक जी और उनकी पत्नी सूनेना द्वारा हल चलाया और उसी से पानी बरसा। इस को याद कर कई आसपास के गांवों की महिलाएं पट्टन पहुंची और उन्होंने ठकुरान श्री से प्रार्थना की । कि अगर आप खेत में हल चलाएं तो परमात्मा की कृपा से हमारे इलाके में बारिश हो जाएगी । ठकुराइन जी ने ठाकुर मर्दन सिंह जी से कहा कि मैं सभी की इच्छा को पूरा करने के लिए खेत में हल चलाने जाना चाहती हूं । आप मुझे आज्ञा दे दें । मर्दनसिंह जी ने कहा क्या तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारे हल चलाने से बारिश हो जाएगी । उन्होंने कहा हां मुझे पूरा विश्वास है । जिस तरह महाराज जनक के हल चलाने से उनके राज्य में सूखा मिट गया था । उसी तरह अगर मैं भी हल चलाऊंगी तो हमारे राज्य में भी सूखा मिट जाएगा । ठाकुर मर्दन सिंह जी ने कहा, ठीक है चले जाओ। लेकिन अगर बारिश नहीं हुई तो वापस लौट कर मत आना ।  अगर बिना पानी गिराये वापस आई तो मैं अपने तेगा से ही तुम्हारी गर्दन को काट दूंगा । अब फैसला तुम कर लो तुम्हें जाना है या नहीं । राजधर्म को मानने वाली ठकुराइन ने फैसला किया कि मैं अपने प्रजा के लिए अवश्य जाऊंगी और बह चली गई । मर्दनसिंह जी उनकी परीक्षा ले रहे थे । ठकुराइन को अपने कर्म पर विश्वास है या नहीं।
 नंगे पैर ठकुराईन खेतौ पर पहुंच कर जैसे ही हल चलाया। ईश्वर की कृपा से धुआंधार पानी बर्षना शुरू हो गया। जगह-जगह तालाब भर गए, नदी उफान मारने लगी।
इस तरह सूखा का संकट टल गया और चारों तरफ हरियाली छा गई लोग झूम उठे हर्षोल्लास चारों तरफ मनाया जाने लगा।

ओमप्रकाश शर्मा
सतपाडा

तलवार की कमाई












राजेश्री रावत  ठाकुर मर्दन सिंह जी की बढ़ती हुई ख्याती से जलते हुए आसपास के जागीरदारों ने ठाकुर मर्दन सिंह जी के खिलाफ ग्वालियर के महाराज के कान भरने शुरू कर दिए ।ठाकुर मर्दन सिंह जी के दरबार में जो भी फरियाद लेकर आता वह चाहे उनके राज्य का हो या दूसरी किसी जागीर का हो। ठाकुर साहब बिल्कुल उसकी मदद करते थे ।ठाकुर साहब ने कभी छोटे बड़े का कोई भेद नहीं किया। जो भी उनके पास अपनी फरियाद लेकर आया उन्होंने उसे निराश नहीं लौटाया। इसी कारण ही उन्हें गढला की लड़ाई लड़नी पड़ी। जहां के मोर्चे पर कई सेनायें असफल हुई उसी को ठाकुर मर्दन सिंह जी ने फतेह किया तथा उस जागीरदार का अभिमान तोड़ने के लिए उसके गड़ी में लगे हुए दो दरवाजे निकाल लाए थे। ठाकुर साहब के साथ अगरा की सेना भी थी इसलिए एक दरवाजा तो आगरा बरखेड़ा भेज दिया और एक दरवाजा पट्टन ले आये थे। यह खबर ग्वालियर पहूंच गई कि ठाकुर मर्दन सिंह अपनी मनमानी करते हैं और ग्वालियर को कर भी नहीं देते । अपनी स्वतंत्र जागीर चलाते हैं। आसपास के सभी राजवंशी, नवाब उनसे परेशान हैं।आसपास के कई चाटूकार जागीरदार ग्वालियर दरबार में पहुंच गए।  उन्होंने महाराज से कहा, महाराज कैसे भी कर के इस पट्टन जागीर को खत्म कर दीजिए। यह अपने आप को स्वतंत्र मानते हैं।
सत्पाडा ग्वालियर सेना की छावनी हुआ करती थी। ग्वालियर से आदेश आया की छावनी को पूरा तैयार कर लिया जाए और पट्टन पर हमले की तैयारी की जाए। तब महाराज स्वयं छावनी में उपस्थित हुए और बाह नदी के इस पार ग्वालियर की सेना लग गई और पट्टन संदेशा भिजवा दिया गया कि महाराज की शरण में जाओ या फिर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ । जब युद्ध की धमकी नन्दवंशी ठाकुर मर्दन सिंह जी के सामने  ने पढ़ी गई । मर्दन सिंह जी ने तुरंत जबाव  दिया। जाओ महाराज से कह देना हम सिर्फ द्वारकाधीश और अपनी कुलदेवी हिंगलाज की शरण में ही सदा रहते इसके अलावा और किसी की शरण स्वीकार नहीं करते । अब रणभूमि में ही भेंट होगी कल । हम पहुंच जाएंगे दूसरे दिन सारे जंगी यदुवंशी सरदारों को बुलावा भेज दिया गया । सभी अपनी अपनी टुुकडियों के साथ बाहनदी के रणखेतों में पहुंच गए और विशाल हाथी पर ठाकुर मर्दन सिंह सवार हो। लशकर के साथ पट््टन से रवाना हुए।
ग्वालियर महाराज ने जब देखा तो पूछा यह इतना बड़ा विशाल लशकर किसका चला आ रहा है। तब दरोगा ने बताया गया कि यही पट्टन के मर्दनसिंह है। महाराजा ने सोचा ऐसे वीर योद्धा हमारे राज्य में रह रहे हैं । बुरा वक्त आने पर यह हमारे बहुत बड़े सहायक के रूप में सिद्ध होंगे । अतः इनको अपने साथ में रखना चाहिए । ग्वालियर के महाराज ने पट्टन के मर्दन सिंह जी के पास संदेशा भिजवाया कि हम आप के साथ वार्ता करना चाहते । मर्दन सिंह जी ने संदेशा स्वीकार करते हुए महाराज के पास हाथी पर सवार हो पहुंच गए । महाराज और मर्दन सिंह जी ने काफी समय तक चर्चाएं हुई और महाराज ने कहा आप जहां है वहीं पर बने रहे । हमें कोई आपत्ति नहीं है । भोजन किये , भोजन के समाप्त होने के बाद में महाराज ने कहा मर्दन सिंह जी एक बात बताइए अब आप किस का दिया हुआ खाते हैं । तव मर्दन सिंह जी ने कमर में बंधी हुई तलवार निकालकर कहा । ग्वालियर के महाराज जी हम अपना तलवार का दिया हुआ खाते हैं । ग्वालियर महाराज यह जवाब सुनकर बहुत खुश हुए और उन्हें अतिरिक्त बारह गांव की जागीर भेंट की।

शनिवार, 25 जुलाई 2020

ठाकुर मर्दन सिंह का कर्ज माफ करना

ठाकुर मर्दन सिंह ने अपना कर्ज ब्राह्मण के ऊपर से किया माफ।



बुजुर्ग बताते हैं कि एक बार पट्टन में इलाहाबाद से एक परिवार पहुंचा। जिसके साथ हाथ जुड़ा हुआ एक बालक था ।उनसे पूछा आप लोगों का यहां आना कैसे हुआ।  तब उन्होंने बताया कि हम पट्टन के जागीरदार मर्दन सिंह जी से मिलने आए हैं ।
दूसरे दिन मर्दन सिंह जी की कचहरी में उन्हें पहुंचा दिया गया। मर्दन सिंह जी ने उनसे पूछा आप लोग इतनी दूर से किस काम से यहां तक आए हैं । तब उन्होंने  बताया कि हमारा यह बालक जन्म से ही दोनों हाथ जुड़े हुए पैदा हुआ है। बहुत इलाज कराया लेकिन इसको फायदा नहीं हुआ । कई देवी-देवताओं के पास गए । ज्यादातर देवी देवताओं ने बताया की यह बालक पिछले जन्म में इलाहाबाद में पूजन कराने वाला पंडित था । जिसे पट्टन के जागीरदार मर्दन सिंह  ने पूजा करने के लिए धन दिया । किंतु इस व्यक्ति ने वह धन भी रख लिया और पूजा भी नहीं की। इसलिए जब तक पट्टन के मर्दन सिंह का इसके ऊपर कर्ज  रहेगा ।  तब तक  इसके हाथ जोड़े ही रहेंगे । अगर मर्दनसिंह कर्ज माफ कर दें तो इसके हाथ खुल जाएंगे।
इलाहाबाद से आए हुए  परिवार के बार-बार प्रार्थना करने पर ठाकुर मर्दन सिंह अपनी कुलदेवी हिंगलाज भवानी के मंदिर में गए और माता से प्रार्थना की। हे मां भवानी इस बालक को स्वस्थ कर दो और  इस बालक को कर्ज मुक्त करने की मुझे शक्ति दो । पूरा  एक दिन मां भवानी के दरबार में खड़े रहे। जब हिंगलाज माता का इशारा हुआ ।  तब कचहरी वापस लौट आकर उन्होंने भरी कचहरी में हाथ जुड़े हुए उस बालक  के सामने खड़े होकर कहा । कुलदेवी हिंगलाज की कृपा से मैंने तुम्हें अपने कर्ज से मुक्त किया । इतना कहते ही उस बालक के हाथ खुल गए । पूरा परिवार ठाकुर मर्दन सिंह के जयकारे लगाता हुआ यथा स्थान वापस चला गया। माता हिंगलाज के ऐसे सच्चे भक्त थे ठाकुर मर्दन सिंह । यह कहानी आज भी कभी-कभार बुजुर्गों के मुंह से सुनने को मिल जाती है।
जय द्वारकाधीश
 जय ठाकुर मर्दन सिंह

सोमवार, 20 जुलाई 2020

ठाकुर मर्दन सिंह के लिए हुई यादव समाज की बैठक

ठाकुर मर्दन सिंह के विषय पर हुई यादव समाज की चर्चा

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18 जुलाई 2020 को यादव समाज विदिशा की बैठक  श्री राधाकृष्ण मंदिर रामलीला चौराहा पर  रखी गई  जिसमें ठाकुर मर्दन सिंह जी के विषय पर चर्चा हुई।
१.  समाज के गौरव महापुरुष, धर्म रक्षक ठाकुर मर्दन सिंह जी की फोटो जन्मष्टमी के कैलेंडर मैं लगाई जायेगी एवं उसके साथ में उनका जीवन चरित्र यादव समाज के घर-घर पहुंचाया जाएगा तथा भविष्य में होने वाली सभी यादव समाज की बैठकों में ठाकुर मर्दन सिंह जी का फोटो बैनर/होडिंग पर लगाना अनिवार्य होगा।
सभी से अपील की गई कि जो भी कृष्ण जन्माष्टमी की बधाई होल्डिंग बैनर लगवाऐगे उस पर 24 अगस्त ठाकुर मर्दन सिंह जी के जन्म दिवस की भी बधाई जरूर लिखवाए एवं उनका फोटो भी लगवाए।
यही अपील विदिशा जिले के सभी तहसीलों ब्लॉक में सक्रिय यादव समाज से की जा रही है।

जिला अध्यक्ष रजनीश यादव ने बताया ठाकुर मर्दन सिंह यदुवंशी पट्टन के जागीरदार थे जिन्होंने धर्म एवं आम जनमानस की रक्षा, मान सम्मान के लिए आत्याचारी नवाबों, अंग्रेजों और राजे रजवाड़ों से पूरे जीवन संघर्ष किया। 18 57 की क्रांति के समय आसपास के सभी जमीदारों , जागीरदारों को अंग्रेजों के विरुद्ध एक किया। आज भी ठाकुर मर्दन सिंह जी का इतिहास राईयों फागों के रूप में गाया जाता है।

 इस बैठक में समाज के सभी सम्मानीय उपस्थित हुए श्री राकेश यादव जी पूर्व पार्षद , श्री जसवंत यादव जी , श्री धर्मेंद्र यादव जी , श्री जितेंद्र यादव जी सरपंच , श्री बलवीर यादव जी , श्री मान सिंह यादव जी , श्री गजेंद्र यादव जी , श्री रविंद्र यादव फौजी, श्री मोहन सिंह यादव, श्री अर्जुन यादव, श्री बबलू यादव, श्री सचिन यादव, श्री हरि सिंह यादव, श्री शेर सिंह यादव, श्री धर्मेंद्र यादव, श्री विपिन यादव, श्री संजय यादव, श्री जगमोहन यादव ,श्री वीरेंद्र यादव, श्री राहुल यादव जी आदि ,

जय श्री क्रिष्ण