बुधवार, 29 जुलाई 2020

ठाकुर मर्दनसिंह जी का तप








विदिशा मुख्यालय  के पास स्थित तिगरा गांव के विश्वकर्मा जी लोहार एक बार पट्टन गए। उन्होंने पट्टन में जाकर अपनी भट्टी लगा दी।  उसमें कोयला और लकडिया डालना शुरू कर दी। इसी समय मर्दनसिंह जी वहां से गुजर रहे थे। उन्होंने पूछा यह कौन है । आदमीयों ने बताया यह टिगरावाले लौहार है जो बहुत ही अच्छी कारीगरी से औजारों का निर्माण कर देते है। मर्दनसिंह जी ने कहा, ठीक है हम देखते हैं कैसे औजार, हथियार बनाते हैं और ठाकुर साहब जहां पर लोहार अपनी भट्टी लगाए हुए थे वही जाकर बैठ गए । लोहार ने अपना जितना भी ईंधन था धीरे-धीरे कर सारा भट्टी में लगा दिया लेकिन उस भट्टी में ताप नहीं आ रहा था । भट्टी में पढ़ा हुआ लोहे गर्म नहीं हो रहा था।  लौहार परेशान हो गया उसने सोचा आज न जाने क्या हो रहा है। आज ही ठाकुर साहब मेरे पास मेरा काम देखने के लिए बैठे हैं और आज ही यह भट्टी लोहा गरम नहीं कर रही है। फिर उसने मर्दन सिंह जी के सामने हाथ जोड़कर कहा हुकुम साहब आज न जाने क्यों मेरी भट्टी में पड़ा हुआ लोहा गरम नहीं हो रहा । मुझे क्षमा कर दीजिए जो मैं आज आपको अपनी प्रतिभा नहीं देखा सका ।
 मर्दन सिंह जी कहा, कोई बात नहीं है। फिर कभी देख लेंगे । यह कह उठ कर चले गए। जैसे ही वे भट्टी से दूर गए । एकदम से भट्टी लाल हो गई  , उसमें पढ़ा हुआ लोहा भी लाल हो गया । लोहार समझ गया यह मर्दन सिंह जी के तप का प्रभाव था कि जब तक वे यहां थे भट्टी का ताप मंदा पड़ रहा। इसीलिए भट्टी में पड़ा हुआ लोहा गरम नहीं हो रहा था । यह कहानी आज भी आसपास के कई गांवों में बताई जाती है सुनाई जाती।

जशमन विश्वकर्मा
टिगरा, विदिशा

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें