श्री कृष्ण की पीडियो में धोबीखेड़ा पुलईया राजवंश में जन्मे ठाकुर साहब घोड़ों के बहुत ही शौकीन थे ठाकुर साहब के घुडसाल में बहुत ही अच्छी अच्छी नस्ल के घोड़े बंधे रहते थे और उन्हें घोड़ों में एक घोड़ी भी थी जिस पर ठाकुर साहब अपनी सवारी करते थे वह घोड़ी ठाकुर साहब को अपने प्राणों समान प्रिय थी बाकी घोड़ों को भले ही उनके कामगार संभालते हो किंतु उस घड़ी को ठाकुर साहब स्वयं ही तैयार करते थे और अपने बच्चे की तरह उसकी देखभाल करते थे एक मर्तबा की बात है सिंधिया महाराज क्षेत्र के दौरे पर निकले थे तभी ठाकुर साहब सजी घोड़ी पर सवार हो महाराज की अगवानी के लिए प्रस्तुत हुए महाराज सिंधिया को बहुत ही सुंदर सजी हुई घोड़ी पसंद आ गई और उन्होंने कहा ठाकुर साहब आपसे निवेदन है यह घोड़ी हमें दे दीजिए।
राजधर्म का पालन करते हुए ठाकुर साहब ने अपने राजा का आग्रह अस्वीकार न करते हुए उस घोड़ी को महाराज सिंधिया को दे देना स्वीकार कर लिया ।
राज धर्म की मर्यादा को निभाते हुए ठाकुर साहब महाराज सिंधिया से न कह सके कि यह घोड़ी मुझे अपने प्राणों से प्रिय है। जैसे ही उस घोड़ी को धोबी खेड़ा प्रतिष्ठान से ले जाया गया। उसे जाते हुए देख वियोग में ठाकुर साहब के प्राण निकल गए। मृत ठाकुर साहब देख अपने सतित्व के धर्म को धारण करने वाली ठकुराइन जी ने उसी समय अपने प्राण छोड़ दिए और कुछ ही दूर जा दूसरे गांव में पहुंचते ही घोड़ी ने भी प्राण त्याग दिए। यह सारी घटनाएं सुन महाराज सिंधिया दौड़े-दौड़े धोबी खेड़ा आए । वह फूट-फूट कर रोने लगे और उसी समय उन्होंने ठाकुर साहब और ठकुराइन जी का विशाल चबूतरे का निर्माण कराया और उनसे क्षमा याचना की ।



