बुधवार, 29 जुलाई 2020

ठाकुर मर्दनसिंह जी का तप








विदिशा मुख्यालय  के पास स्थित तिगरा गांव के विश्वकर्मा जी लोहार एक बार पट्टन गए। उन्होंने पट्टन में जाकर अपनी भट्टी लगा दी।  उसमें कोयला और लकडिया डालना शुरू कर दी। इसी समय मर्दनसिंह जी वहां से गुजर रहे थे। उन्होंने पूछा यह कौन है । आदमीयों ने बताया यह टिगरावाले लौहार है जो बहुत ही अच्छी कारीगरी से औजारों का निर्माण कर देते है। मर्दनसिंह जी ने कहा, ठीक है हम देखते हैं कैसे औजार, हथियार बनाते हैं और ठाकुर साहब जहां पर लोहार अपनी भट्टी लगाए हुए थे वही जाकर बैठ गए । लोहार ने अपना जितना भी ईंधन था धीरे-धीरे कर सारा भट्टी में लगा दिया लेकिन उस भट्टी में ताप नहीं आ रहा था । भट्टी में पढ़ा हुआ लोहे गर्म नहीं हो रहा था।  लौहार परेशान हो गया उसने सोचा आज न जाने क्या हो रहा है। आज ही ठाकुर साहब मेरे पास मेरा काम देखने के लिए बैठे हैं और आज ही यह भट्टी लोहा गरम नहीं कर रही है। फिर उसने मर्दन सिंह जी के सामने हाथ जोड़कर कहा हुकुम साहब आज न जाने क्यों मेरी भट्टी में पड़ा हुआ लोहा गरम नहीं हो रहा । मुझे क्षमा कर दीजिए जो मैं आज आपको अपनी प्रतिभा नहीं देखा सका ।
 मर्दन सिंह जी कहा, कोई बात नहीं है। फिर कभी देख लेंगे । यह कह उठ कर चले गए। जैसे ही वे भट्टी से दूर गए । एकदम से भट्टी लाल हो गई  , उसमें पढ़ा हुआ लोहा भी लाल हो गया । लोहार समझ गया यह मर्दन सिंह जी के तप का प्रभाव था कि जब तक वे यहां थे भट्टी का ताप मंदा पड़ रहा। इसीलिए भट्टी में पड़ा हुआ लोहा गरम नहीं हो रहा था । यह कहानी आज भी आसपास के कई गांवों में बताई जाती है सुनाई जाती।

जशमन विश्वकर्मा
टिगरा, विदिशा

ठकुराईन का प्रण

ठकुराइन के प्राण से हुई धुआंधार बारिश










 एक बार पट्टन जागीर में भारी सूखा पड़ा। लोग पानी के लिए तरसने लगे। कुछ लोगों ने त्रेता युग की कथा याद कर के जनक जी और उनकी पत्नी सूनेना द्वारा हल चलाया और उसी से पानी बरसा। इस को याद कर कई आसपास के गांवों की महिलाएं पट्टन पहुंची और उन्होंने ठकुरान श्री से प्रार्थना की । कि अगर आप खेत में हल चलाएं तो परमात्मा की कृपा से हमारे इलाके में बारिश हो जाएगी । ठकुराइन जी ने ठाकुर मर्दन सिंह जी से कहा कि मैं सभी की इच्छा को पूरा करने के लिए खेत में हल चलाने जाना चाहती हूं । आप मुझे आज्ञा दे दें । मर्दनसिंह जी ने कहा क्या तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारे हल चलाने से बारिश हो जाएगी । उन्होंने कहा हां मुझे पूरा विश्वास है । जिस तरह महाराज जनक के हल चलाने से उनके राज्य में सूखा मिट गया था । उसी तरह अगर मैं भी हल चलाऊंगी तो हमारे राज्य में भी सूखा मिट जाएगा । ठाकुर मर्दन सिंह जी ने कहा, ठीक है चले जाओ। लेकिन अगर बारिश नहीं हुई तो वापस लौट कर मत आना ।  अगर बिना पानी गिराये वापस आई तो मैं अपने तेगा से ही तुम्हारी गर्दन को काट दूंगा । अब फैसला तुम कर लो तुम्हें जाना है या नहीं । राजधर्म को मानने वाली ठकुराइन ने फैसला किया कि मैं अपने प्रजा के लिए अवश्य जाऊंगी और बह चली गई । मर्दनसिंह जी उनकी परीक्षा ले रहे थे । ठकुराइन को अपने कर्म पर विश्वास है या नहीं।
 नंगे पैर ठकुराईन खेतौ पर पहुंच कर जैसे ही हल चलाया। ईश्वर की कृपा से धुआंधार पानी बर्षना शुरू हो गया। जगह-जगह तालाब भर गए, नदी उफान मारने लगी।
इस तरह सूखा का संकट टल गया और चारों तरफ हरियाली छा गई लोग झूम उठे हर्षोल्लास चारों तरफ मनाया जाने लगा।

ओमप्रकाश शर्मा
सतपाडा

तलवार की कमाई












राजेश्री रावत  ठाकुर मर्दन सिंह जी की बढ़ती हुई ख्याती से जलते हुए आसपास के जागीरदारों ने ठाकुर मर्दन सिंह जी के खिलाफ ग्वालियर के महाराज के कान भरने शुरू कर दिए ।ठाकुर मर्दन सिंह जी के दरबार में जो भी फरियाद लेकर आता वह चाहे उनके राज्य का हो या दूसरी किसी जागीर का हो। ठाकुर साहब बिल्कुल उसकी मदद करते थे ।ठाकुर साहब ने कभी छोटे बड़े का कोई भेद नहीं किया। जो भी उनके पास अपनी फरियाद लेकर आया उन्होंने उसे निराश नहीं लौटाया। इसी कारण ही उन्हें गढला की लड़ाई लड़नी पड़ी। जहां के मोर्चे पर कई सेनायें असफल हुई उसी को ठाकुर मर्दन सिंह जी ने फतेह किया तथा उस जागीरदार का अभिमान तोड़ने के लिए उसके गड़ी में लगे हुए दो दरवाजे निकाल लाए थे। ठाकुर साहब के साथ अगरा की सेना भी थी इसलिए एक दरवाजा तो आगरा बरखेड़ा भेज दिया और एक दरवाजा पट्टन ले आये थे। यह खबर ग्वालियर पहूंच गई कि ठाकुर मर्दन सिंह अपनी मनमानी करते हैं और ग्वालियर को कर भी नहीं देते । अपनी स्वतंत्र जागीर चलाते हैं। आसपास के सभी राजवंशी, नवाब उनसे परेशान हैं।आसपास के कई चाटूकार जागीरदार ग्वालियर दरबार में पहुंच गए।  उन्होंने महाराज से कहा, महाराज कैसे भी कर के इस पट्टन जागीर को खत्म कर दीजिए। यह अपने आप को स्वतंत्र मानते हैं।
सत्पाडा ग्वालियर सेना की छावनी हुआ करती थी। ग्वालियर से आदेश आया की छावनी को पूरा तैयार कर लिया जाए और पट्टन पर हमले की तैयारी की जाए। तब महाराज स्वयं छावनी में उपस्थित हुए और बाह नदी के इस पार ग्वालियर की सेना लग गई और पट्टन संदेशा भिजवा दिया गया कि महाराज की शरण में जाओ या फिर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ । जब युद्ध की धमकी नन्दवंशी ठाकुर मर्दन सिंह जी के सामने  ने पढ़ी गई । मर्दन सिंह जी ने तुरंत जबाव  दिया। जाओ महाराज से कह देना हम सिर्फ द्वारकाधीश और अपनी कुलदेवी हिंगलाज की शरण में ही सदा रहते इसके अलावा और किसी की शरण स्वीकार नहीं करते । अब रणभूमि में ही भेंट होगी कल । हम पहुंच जाएंगे दूसरे दिन सारे जंगी यदुवंशी सरदारों को बुलावा भेज दिया गया । सभी अपनी अपनी टुुकडियों के साथ बाहनदी के रणखेतों में पहुंच गए और विशाल हाथी पर ठाकुर मर्दन सिंह सवार हो। लशकर के साथ पट््टन से रवाना हुए।
ग्वालियर महाराज ने जब देखा तो पूछा यह इतना बड़ा विशाल लशकर किसका चला आ रहा है। तब दरोगा ने बताया गया कि यही पट्टन के मर्दनसिंह है। महाराजा ने सोचा ऐसे वीर योद्धा हमारे राज्य में रह रहे हैं । बुरा वक्त आने पर यह हमारे बहुत बड़े सहायक के रूप में सिद्ध होंगे । अतः इनको अपने साथ में रखना चाहिए । ग्वालियर के महाराज ने पट्टन के मर्दन सिंह जी के पास संदेशा भिजवाया कि हम आप के साथ वार्ता करना चाहते । मर्दन सिंह जी ने संदेशा स्वीकार करते हुए महाराज के पास हाथी पर सवार हो पहुंच गए । महाराज और मर्दन सिंह जी ने काफी समय तक चर्चाएं हुई और महाराज ने कहा आप जहां है वहीं पर बने रहे । हमें कोई आपत्ति नहीं है । भोजन किये , भोजन के समाप्त होने के बाद में महाराज ने कहा मर्दन सिंह जी एक बात बताइए अब आप किस का दिया हुआ खाते हैं । तव मर्दन सिंह जी ने कमर में बंधी हुई तलवार निकालकर कहा । ग्वालियर के महाराज जी हम अपना तलवार का दिया हुआ खाते हैं । ग्वालियर महाराज यह जवाब सुनकर बहुत खुश हुए और उन्हें अतिरिक्त बारह गांव की जागीर भेंट की।

शनिवार, 25 जुलाई 2020

ठाकुर मर्दन सिंह का कर्ज माफ करना

ठाकुर मर्दन सिंह ने अपना कर्ज ब्राह्मण के ऊपर से किया माफ।



बुजुर्ग बताते हैं कि एक बार पट्टन में इलाहाबाद से एक परिवार पहुंचा। जिसके साथ हाथ जुड़ा हुआ एक बालक था ।उनसे पूछा आप लोगों का यहां आना कैसे हुआ।  तब उन्होंने बताया कि हम पट्टन के जागीरदार मर्दन सिंह जी से मिलने आए हैं ।
दूसरे दिन मर्दन सिंह जी की कचहरी में उन्हें पहुंचा दिया गया। मर्दन सिंह जी ने उनसे पूछा आप लोग इतनी दूर से किस काम से यहां तक आए हैं । तब उन्होंने  बताया कि हमारा यह बालक जन्म से ही दोनों हाथ जुड़े हुए पैदा हुआ है। बहुत इलाज कराया लेकिन इसको फायदा नहीं हुआ । कई देवी-देवताओं के पास गए । ज्यादातर देवी देवताओं ने बताया की यह बालक पिछले जन्म में इलाहाबाद में पूजन कराने वाला पंडित था । जिसे पट्टन के जागीरदार मर्दन सिंह  ने पूजा करने के लिए धन दिया । किंतु इस व्यक्ति ने वह धन भी रख लिया और पूजा भी नहीं की। इसलिए जब तक पट्टन के मर्दन सिंह का इसके ऊपर कर्ज  रहेगा ।  तब तक  इसके हाथ जोड़े ही रहेंगे । अगर मर्दनसिंह कर्ज माफ कर दें तो इसके हाथ खुल जाएंगे।
इलाहाबाद से आए हुए  परिवार के बार-बार प्रार्थना करने पर ठाकुर मर्दन सिंह अपनी कुलदेवी हिंगलाज भवानी के मंदिर में गए और माता से प्रार्थना की। हे मां भवानी इस बालक को स्वस्थ कर दो और  इस बालक को कर्ज मुक्त करने की मुझे शक्ति दो । पूरा  एक दिन मां भवानी के दरबार में खड़े रहे। जब हिंगलाज माता का इशारा हुआ ।  तब कचहरी वापस लौट आकर उन्होंने भरी कचहरी में हाथ जुड़े हुए उस बालक  के सामने खड़े होकर कहा । कुलदेवी हिंगलाज की कृपा से मैंने तुम्हें अपने कर्ज से मुक्त किया । इतना कहते ही उस बालक के हाथ खुल गए । पूरा परिवार ठाकुर मर्दन सिंह के जयकारे लगाता हुआ यथा स्थान वापस चला गया। माता हिंगलाज के ऐसे सच्चे भक्त थे ठाकुर मर्दन सिंह । यह कहानी आज भी कभी-कभार बुजुर्गों के मुंह से सुनने को मिल जाती है।
जय द्वारकाधीश
 जय ठाकुर मर्दन सिंह

सोमवार, 20 जुलाई 2020

ठाकुर मर्दन सिंह के लिए हुई यादव समाज की बैठक

ठाकुर मर्दन सिंह के विषय पर हुई यादव समाज की चर्चा

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18 जुलाई 2020 को यादव समाज विदिशा की बैठक  श्री राधाकृष्ण मंदिर रामलीला चौराहा पर  रखी गई  जिसमें ठाकुर मर्दन सिंह जी के विषय पर चर्चा हुई।
१.  समाज के गौरव महापुरुष, धर्म रक्षक ठाकुर मर्दन सिंह जी की फोटो जन्मष्टमी के कैलेंडर मैं लगाई जायेगी एवं उसके साथ में उनका जीवन चरित्र यादव समाज के घर-घर पहुंचाया जाएगा तथा भविष्य में होने वाली सभी यादव समाज की बैठकों में ठाकुर मर्दन सिंह जी का फोटो बैनर/होडिंग पर लगाना अनिवार्य होगा।
सभी से अपील की गई कि जो भी कृष्ण जन्माष्टमी की बधाई होल्डिंग बैनर लगवाऐगे उस पर 24 अगस्त ठाकुर मर्दन सिंह जी के जन्म दिवस की भी बधाई जरूर लिखवाए एवं उनका फोटो भी लगवाए।
यही अपील विदिशा जिले के सभी तहसीलों ब्लॉक में सक्रिय यादव समाज से की जा रही है।

जिला अध्यक्ष रजनीश यादव ने बताया ठाकुर मर्दन सिंह यदुवंशी पट्टन के जागीरदार थे जिन्होंने धर्म एवं आम जनमानस की रक्षा, मान सम्मान के लिए आत्याचारी नवाबों, अंग्रेजों और राजे रजवाड़ों से पूरे जीवन संघर्ष किया। 18 57 की क्रांति के समय आसपास के सभी जमीदारों , जागीरदारों को अंग्रेजों के विरुद्ध एक किया। आज भी ठाकुर मर्दन सिंह जी का इतिहास राईयों फागों के रूप में गाया जाता है।

 इस बैठक में समाज के सभी सम्मानीय उपस्थित हुए श्री राकेश यादव जी पूर्व पार्षद , श्री जसवंत यादव जी , श्री धर्मेंद्र यादव जी , श्री जितेंद्र यादव जी सरपंच , श्री बलवीर यादव जी , श्री मान सिंह यादव जी , श्री गजेंद्र यादव जी , श्री रविंद्र यादव फौजी, श्री मोहन सिंह यादव, श्री अर्जुन यादव, श्री बबलू यादव, श्री सचिन यादव, श्री हरि सिंह यादव, श्री शेर सिंह यादव, श्री धर्मेंद्र यादव, श्री विपिन यादव, श्री संजय यादव, श्री जगमोहन यादव ,श्री वीरेंद्र यादव, श्री राहुल यादव जी आदि ,

जय श्री क्रिष्ण

शुक्रवार, 5 जून 2020

ठा. दुर्जनसिंह



योगीराज भगवान श्री कृष्ण की वीर नस्ल के पुलईया राज घराना अंतर्गत थाना जागीरदारी के ठाकुर दुर्जन सिंह यदुवंशी।


थाना जागीर की स्थापना संवत् 1740 के लगभग ठाकुर लाल सिंह जी ने की थी। जिसका क्षेत्र पांच गांव हुआ करता था।
वर्तमान में ठाकुर दुर्जन सिंह जी के वंशज थाना व बूढ़ाखेड़ा गांव में निवास करते हैं

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

ठा. रणजीत सिंह यदुवंशी

सेहजाखेड़ी- रामगढ़ के ठाकुर रणजीत सिंह यदुवंशी-


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मध्यप्रदेश में स्थित है द्वारिकाधीश के पीढ़ी के महाराजा प्रह्लाद दास यदुवंशी की वीर नस्ल पुलईया गोत्रीय यदुवंशी अहीर क्षत्रियों की प्रतिष्ठित सहजाखेड़ी जमीदारी जिसके आखिरी सबसे प्रभावशाली ज़ोरावर जमीदारों में से एक हुआ करते थे 157वी पीडी के स्वर्गीय ठाकुर रणजीत सिंह जी यादव।

पुलइया अहीर राजवंश का वैसे मुख्य घरानों में पट्टन रहा है लेकिन कालांतर में इस घराने के वंशजो के भिन्न भिन्न स्थानों पर आबाद होने के कारण ये कई छोटी छोटी जागीरों में बंटा ।


बंटवारे के पश्चात स्वर्गीय ठाकुर हैवत सिंह जी यदुवंशी ने  सेहजाखेड़ी जागीर बसाई।

बाय नदी के तट पर सेहजाखेड़ी में पुलैया अहीर ठाकुरों ने नई गढ़ी का निर्माण करवाया जो बहुत बड़े क्षेत्र में फैली हुई थी।

ये भव्य गढ़ी बाय नदी में आई भयंकर बाढ़ में नष्ट हो गई थी। आज भी उसके अवशेष मिलते है।


इस जागीरदार घराने के वंशजों के शानो शोकत को कुछ इस तरह बयां किया है।

सोने के घिसाना थे जिनके, पीकदान थे चांदी के।
 चांदी मूठ लगी तलवारें, स्वर्ण दीप दिवाली के ।।

आदि जो इसके सम्पन्नता की दास्तां बयां करते हैं।।

सहजाखेड़ी-रामगढ़ जागीरदारी के जोरावर जागीरदारों के नाम-

 ठाकुर श्री हैवत सिंह (संस्थापक),  ठाकुर श्री निर्भय सिंह यादव,  ठाकुर श्री मोती सिंह

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आज बात करेंगे इस घराने के आखिरी सबसे प्रभावशाली और शूरवीर जागीरदार ठाकुर श्री रणजीत सिंह जी की।

सेहजाखेड़ी रामगढ़ के प्रभावशाली जागीरदारों में से एक ठाकुर रणजीत  सिंह जी के बारे में कहावत है कि वो स्वभाव से काफ़ी गुस्सेल, सख़्त किंतु अत्यंत न्यायप्रिय शासक थे।

इलाके के चारण-भाट और लोग बतलाते हैं कि ठाकुर श्री रणजीत सिंह जी का जैसा नाम था वो थे भी वैसे ही शूरवीर तथा उस समय पूरे रायसेन तथा विदिशा जिले की पंचायत इन्हीं के छांव में लगती थी।

अपने शौर्यवान महान पूर्वजो ठाकुर श्री दलेल सिंह, ठाकुर श्री मोती सिंह , ठाकुर श्री मर्दनसिंह आदि की ही भाँति ये कीर्तिवान और दिलेर थे।

गाँव के लोग बतलाते हैं कि ठाकुर श्री रणजीत सिंह जी को अपने शौर्यवान पूर्वजों तथा अपने यदुवंशी कुल का क्षत्रिय होने का बहोत गुमान और गर्व था, उनकी गर्दन हरमेशा शान से तनी रहती।

ठाकुर साहब का विवाह नरसिंह गढ़ जागीरदारी के यदुवंशी अहीर ठाकुरों की सुपुत्री से बड़े लाव लश्कर में सम्पन्न हुआ था और कहा जाता है कि नरसिंह गढ़ वालों ने सहजाखेड़ी-रामगढ़ घराने की साख को देख भेंट स्वरूप कई शाही घोड़ों से लदे स्वर्ण, हीरे, रत्न आदि प्रस्तुत किये थे।

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लोग बतलाते हैं कि ठाकुर श्री रणजीत सिंह जी को अपनी शान में गुस्ताखी बिल्कुल नगवार थी।

ऐसा कहा जाता है कि इनके घोड़े के टापों की आवाज सुनकर ही गांव के सभी लोग चौक में इखट्टे हो जाते थे और अपनी तोजी (लगान) चुकाया करते ।

जो इस अनुशासन का पालन नहीं करता था तो उसे सभी के समक्ष दंडित किया करते थे।



 जब भी वे अपने घोड़े पर सज्ज होकर निकलते तो उनके घोड़ो की टापों की आवाज़ सुन गांव वाले इनके सम्मान में सर झुकाकर पलकें बिछाये इनके पीछे पीछे गाँव की सीमा तक चलते।।

अगर किसी ने अकड़ दिखा इनकी शान में गुस्ताखी करने की हिमाकत की तो उन्हें ठाकुर साहब स्वयं अपने हंटर से दंडित करते पूरे गाँव वालों के समक्ष।

इस वाक्ये से ये ज़रूर मालुम पड़ता है कि ठाकुर श्री रणजीत सिंह काफ़ी सख़्त और क्रूर थे लेकिन इसके साथ साथ वे एक न्यायप्रिय और अत्यंत अनुशासित और मज़बूत शासक थे।

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हजारों साल नरगिस अपनी बे नूरी पर रोती है।
बडी मुश्किल से होता है चमन मे ठाकुर रणजीत जैसा दीदावर पैदा।

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रणबंका यदुवीर।

मंगलवार, 3 मार्च 2020

धौवीखेडा जमींदारी









 श्री कृष्ण की पीडियो में धोबीखेड़ा पुलईया राजवंश में जन्मे ठाकुर साहब घोड़ों के बहुत ही शौकीन थे ठाकुर साहब के घुडसाल में बहुत ही अच्छी अच्छी नस्ल के घोड़े बंधे रहते थे और उन्हें घोड़ों में एक घोड़ी भी थी जिस पर ठाकुर साहब अपनी सवारी करते थे वह घोड़ी ठाकुर साहब को अपने प्राणों समान प्रिय थी बाकी घोड़ों को भले ही उनके कामगार संभालते हो किंतु उस घड़ी को ठाकुर साहब स्वयं ही तैयार करते थे और अपने बच्चे की तरह उसकी देखभाल करते थे एक मर्तबा की बात है  सिंधिया महाराज क्षेत्र के दौरे पर  निकले थे तभी ठाकुर साहब सजी घोड़ी पर सवार हो महाराज की अगवानी के लिए प्रस्तुत हुए महाराज सिंधिया को बहुत ही सुंदर सजी हुई घोड़ी पसंद आ गई और उन्होंने कहा ठाकुर साहब आपसे निवेदन है यह घोड़ी हमें दे दीजिए।
 राजधर्म का पालन करते हुए ठाकुर साहब ने अपने राजा का  आग्रह अस्वीकार न करते हुए उस घोड़ी को महाराज सिंधिया को दे देना स्वीकार कर लिया ।
 राज धर्म की मर्यादा को निभाते हुए ठाकुर साहब महाराज सिंधिया से न कह सके कि यह घोड़ी मुझे अपने प्राणों से प्रिय है। जैसे ही उस घोड़ी को धोबी खेड़ा प्रतिष्ठान से ले जाया गया। उसे जाते हुए देख वियोग में ठाकुर साहब के प्राण निकल गए। मृत ठाकुर साहब देख अपने सतित्व के धर्म को धारण करने वाली ठकुराइन जी ने उसी समय अपने प्राण छोड़ दिए और कुछ ही दूर जा दूसरे गांव में पहुंचते ही घोड़ी ने भी प्राण त्याग दिए। यह सारी घटनाएं सुन महाराज सिंधिया दौड़े-दौड़े धोबी खेड़ा आए । वह फूट-फूट कर रोने लगे और उसी समय उन्होंने ठाकुर साहब और ठकुराइन जी का  विशाल चबूतरे का निर्माण कराया और उनसे क्षमा याचना की ।

शनिवार, 18 जनवरी 2020

ठाकुर मर्दन सिंह की दुहाई

ग्वालियर के महाराज सिंधिया द्वारा मर्दन सिंह जी की दुहाई दे बकरे का शीश काटना।



द्वारकाधीश भगवान श्री कृष्ण की 155वी पीढ़ीयों में पुलईया राजघराने में जन्मे ठाकुर मर्दन सिंह जी कि पूरे क्षेत्र में बढ़ती हुई प्रतिष्ठा से आसपास के कई राजघराने मैं जलन होने लगी ।जो कि हमेशा से ही क्षत्रियों में अबगुण विद्यमान रहा और जिसका दंश पूरे देश ने झेला ।
महाराजा सिंधिया के दरबार में भी मर्दन सिंह जी के शौर्य और उनके देवत्व पूर्ण कार्यों की प्रशंसा बढ़ने लगी । जिससे तिलमिला कर एक दिन महाराज सिंधिया ने दरबार में कहा। क्या वह इतना महान व्यक्ति है जिसमें आप लोग देवत्व की बात करते हैं ।
 किसी ने कहा हां ऐसा ही है हमने ऐसा ही सुना है ।अहीरवाड़ा के लोग ऐसे ही बात करते है। तब राजा सिंधिया ने कहा । अच्छा लो आज मैं उसके नाम का बकरा काट देता हूं देखता हूं कितना सत्य है उसमें ।
महाराज  सिंधिया ने बकरे का सिर कटवाया उसी समय कहीं से कुत्ता दौड़ता हुआ आया  और उस कटे हुए शीश को लेकर कई दिनों की यात्रा कर पट्टन पहुंच गया । एक सैन्य दस्ता भी उस कुत्ते के पीछे पीछे पट्टन चला आया । जब मर्दन सिंह जी ने देखा तो उन्होंने कहा ठीक है महाराज का बुलावा आ गया चलिए  महाराज से मिलाते हैं और उस कुत्ते के साथ ही जिसके पीछे ग्वालियर का एक सैन्य दस्ता भी चल रहा था।  ठाकुर मर्दन सिंह जी ग्वालियर के दरबार में बकरे के शीश लिए कुत्ते के साथ उपस्थित हो गए और ठाकुर मर्दन सिंह जी ने  सहज भाव से  कहा कि महाराज आप महाराज है और मैं एक छोटी सी जागीर का सेवक हूं । आपके सामने मेरा क्या मान । व्यर्थ ही आपने इस बेजुबान का वध कर दिया । ग्वालियर के महाराज सिंधिया  ने इतने प्रेम भरे और विनीत वचन सुन ठाकुर मर्दन सिंह जी को अपने गले से लगा लिया और कहा मुझे क्षमा कर दीजिए ।

जय द्वारिकाधीश।