राजेश्री रावत ठाकुर मर्दन सिंह जी की बढ़ती हुई ख्याती से जलते हुए आसपास के जागीरदारों ने ठाकुर मर्दन सिंह जी के खिलाफ ग्वालियर के महाराज के कान भरने शुरू कर दिए ।ठाकुर मर्दन सिंह जी के दरबार में जो भी फरियाद लेकर आता वह चाहे उनके राज्य का हो या दूसरी किसी जागीर का हो। ठाकुर साहब बिल्कुल उसकी मदद करते थे ।ठाकुर साहब ने कभी छोटे बड़े का कोई भेद नहीं किया। जो भी उनके पास अपनी फरियाद लेकर आया उन्होंने उसे निराश नहीं लौटाया। इसी कारण ही उन्हें गढला की लड़ाई लड़नी पड़ी। जहां के मोर्चे पर कई सेनायें असफल हुई उसी को ठाकुर मर्दन सिंह जी ने फतेह किया तथा उस जागीरदार का अभिमान तोड़ने के लिए उसके गड़ी में लगे हुए दो दरवाजे निकाल लाए थे। ठाकुर साहब के साथ अगरा की सेना भी थी इसलिए एक दरवाजा तो आगरा बरखेड़ा भेज दिया और एक दरवाजा पट्टन ले आये थे। यह खबर ग्वालियर पहूंच गई कि ठाकुर मर्दन सिंह अपनी मनमानी करते हैं और ग्वालियर को कर भी नहीं देते । अपनी स्वतंत्र जागीर चलाते हैं। आसपास के सभी राजवंशी, नवाब उनसे परेशान हैं।आसपास के कई चाटूकार जागीरदार ग्वालियर दरबार में पहुंच गए। उन्होंने महाराज से कहा, महाराज कैसे भी कर के इस पट्टन जागीर को खत्म कर दीजिए। यह अपने आप को स्वतंत्र मानते हैं।
सत्पाडा ग्वालियर सेना की छावनी हुआ करती थी। ग्वालियर से आदेश आया की छावनी को पूरा तैयार कर लिया जाए और पट्टन पर हमले की तैयारी की जाए। तब महाराज स्वयं छावनी में उपस्थित हुए और बाह नदी के इस पार ग्वालियर की सेना लग गई और पट्टन संदेशा भिजवा दिया गया कि महाराज की शरण में जाओ या फिर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ । जब युद्ध की धमकी नन्दवंशी ठाकुर मर्दन सिंह जी के सामने ने पढ़ी गई । मर्दन सिंह जी ने तुरंत जबाव दिया। जाओ महाराज से कह देना हम सिर्फ द्वारकाधीश और अपनी कुलदेवी हिंगलाज की शरण में ही सदा रहते इसके अलावा और किसी की शरण स्वीकार नहीं करते । अब रणभूमि में ही भेंट होगी कल । हम पहुंच जाएंगे दूसरे दिन सारे जंगी यदुवंशी सरदारों को बुलावा भेज दिया गया । सभी अपनी अपनी टुुकडियों के साथ बाहनदी के रणखेतों में पहुंच गए और विशाल हाथी पर ठाकुर मर्दन सिंह सवार हो। लशकर के साथ पट््टन से रवाना हुए।
ग्वालियर महाराज ने जब देखा तो पूछा यह इतना बड़ा विशाल लशकर किसका चला आ रहा है। तब दरोगा ने बताया गया कि यही पट्टन के मर्दनसिंह है। महाराजा ने सोचा ऐसे वीर योद्धा हमारे राज्य में रह रहे हैं । बुरा वक्त आने पर यह हमारे बहुत बड़े सहायक के रूप में सिद्ध होंगे । अतः इनको अपने साथ में रखना चाहिए । ग्वालियर के महाराज ने पट्टन के मर्दन सिंह जी के पास संदेशा भिजवाया कि हम आप के साथ वार्ता करना चाहते । मर्दन सिंह जी ने संदेशा स्वीकार करते हुए महाराज के पास हाथी पर सवार हो पहुंच गए । महाराज और मर्दन सिंह जी ने काफी समय तक चर्चाएं हुई और महाराज ने कहा आप जहां है वहीं पर बने रहे । हमें कोई आपत्ति नहीं है । भोजन किये , भोजन के समाप्त होने के बाद में महाराज ने कहा मर्दन सिंह जी एक बात बताइए अब आप किस का दिया हुआ खाते हैं । तव मर्दन सिंह जी ने कमर में बंधी हुई तलवार निकालकर कहा । ग्वालियर के महाराज जी हम अपना तलवार का दिया हुआ खाते हैं । ग्वालियर महाराज यह जवाब सुनकर बहुत खुश हुए और उन्हें अतिरिक्त बारह गांव की जागीर भेंट की।
ग्वालियर महाराज ने जब देखा तो पूछा यह इतना बड़ा विशाल लशकर किसका चला आ रहा है। तब दरोगा ने बताया गया कि यही पट्टन के मर्दनसिंह है। महाराजा ने सोचा ऐसे वीर योद्धा हमारे राज्य में रह रहे हैं । बुरा वक्त आने पर यह हमारे बहुत बड़े सहायक के रूप में सिद्ध होंगे । अतः इनको अपने साथ में रखना चाहिए । ग्वालियर के महाराज ने पट्टन के मर्दन सिंह जी के पास संदेशा भिजवाया कि हम आप के साथ वार्ता करना चाहते । मर्दन सिंह जी ने संदेशा स्वीकार करते हुए महाराज के पास हाथी पर सवार हो पहुंच गए । महाराज और मर्दन सिंह जी ने काफी समय तक चर्चाएं हुई और महाराज ने कहा आप जहां है वहीं पर बने रहे । हमें कोई आपत्ति नहीं है । भोजन किये , भोजन के समाप्त होने के बाद में महाराज ने कहा मर्दन सिंह जी एक बात बताइए अब आप किस का दिया हुआ खाते हैं । तव मर्दन सिंह जी ने कमर में बंधी हुई तलवार निकालकर कहा । ग्वालियर के महाराज जी हम अपना तलवार का दिया हुआ खाते हैं । ग्वालियर महाराज यह जवाब सुनकर बहुत खुश हुए और उन्हें अतिरिक्त बारह गांव की जागीर भेंट की।

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