शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

ठाकुर मोती सिंह यदुवंशी

ठाकुर मोती सिंह यदुवंशी


ठाकुर मोती सिंह यदुवंशी 

ठाकुर मोती सिंह यदुवंशी सेहजाखेड़ी खेड़ी जागीर के जोरावर जागीरदार थे।
 एक मर्तबा शमशाबाद के अमीर लाला जी सेहजाखेड़ी दरबार में उपस्थित हुए। ठाकुर मोती सिंह जी हम बड़ी मुसीबत में हैं मेवाती लुटेरे ने हमारी हवेली को लूटने का मंसूबा तैयार कर लिया है। बड़ी विनम्रता और भरोसे के साथ हम आपके सामने अपनी रक्षा की गुहार लगाते हैं। क्षत्रिय धर्म को निभाते हुए आप हमारी रक्षा करें। ठाकुर मोती सिंह जी ने उनसे कहा आप निर्भय हो जायें। कोई भी मेवाती आप को नुकसान नहीं पहुंचा पाएगा।  इसके बाद ठाकुर साहब ने अपने सभी धसजातीय  जागीरदारों के यदुवंशी ठिकानों को संदेशा भिजवा दिया और सभी ने एकत्रित होकर शमशबाद के पठार पर डेरा लगा दिया। दूसरे ही दिन मेवाती लूटेरों से जमकर लडाई हुई। लूटेरे मेवों के रण खेतों से पैर उखड गये। मेवातीयो के सरदार को  दंडबंधा लिया गया ।

मेवितीयों के सरदार ने क्षमा प्रार्थना की और भविष्य में इस इलाके में कभी भी वह और उसके साथियों द्वारा लूटपाट नहीं की जाएगी यह वचन दिया। बार-बार क्षमा मांगने से ठाकुर मोती सिंह जी ने उसे क्षमा कर दिया और उसके दंड खुलवा दिए।

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अमर रहो यादव राजघराने गिरधर के प्यारे।
भूपन में भूप तू ही गिरधर के रूप तू ही।।

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 इस पोस्ट का आधार लोकिक किम्बदंतियां

जय द्वारिकाधीश।     जय मां भवानी।   जय मां भारती।

बलीदानी कमलावती-विमलावती

बलीदानी कमलावती-विमलावती


यदुवंशी वीरांगना राजकुमारी विमलावती और कमलावती का अमर बलिदान।
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भारतवर्ष को अखंड बनाने में जितना योगदान क्षत्रियों का है उतना ही योगदान क्षत्राणियों का है जिन्होंने समय समय पर अपना बलिदान दे वीरता के उदाहरण पेश किए।

आज जिन दो क्षत्राणियों का इतिहास बताने वाले हैं वो दोनो यदुवंशी घराने की अहीर क्षत्राणियां हैं जिन्होंने अपने शीश काट दिए लेकिन अपने क्षत्रिय कुल को लज्जीत न होने दिया।
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महाराजा प्रहलाद सिंह के पीढ़ी में जन्मे नहरयाई जागीरदारी घराने के उस समय के ज़ोरावर शासक राजा पीरसाय सिंह भगवान कृष्ण की पीढ़ी के 152वे थे।

पुलहिया अहीर ठाकुरों के नहरयाई प्रतिष्ठान जागीर में आगे चल दो देवकन्याओं, राजकुमारी कमलावती और विमलावती का जन्म हुआ अत्याधिक सुंदर और गुणवान थीं।

ये दोनों राजकुमारियां इतनी सौंदर्यवान थीं कि इनके सुंदरता की खबर सुन भोपाल नवाब बदनीयत हो गया था।

उस कामी नीच नवाब को जब पता लगा कि नहरयाई घराने की इन दोनों राजकुमारियों के पिता मूलतः विदिशा के यदुवंशी ठाकुरों के पट्टन राजघराने के भाई बंधु हैं तो नवाब गुस्से आग बबूला हो गया क्यूंकि पूर्व में इसी कुटुंब के ठाकुर मर्दनसिंह यादव जी ने भोपाल नवाब को अपमानित किया था।

कहा जाता है भोपाल नवाब ने मालवा के यदुवंशी अहीर ठाकुरों की साख को कम करने के लिए एक बार नहरयाई के तदकालीन जागीरदार को पत्र के माध्यम से उनकी राजकन्याओं विमलावाती और कमलावती से विवाह करने की इच्छा जताई अन्यथा नहरयाई को भोपाल की सेना से सामना करने की धमकी दे डाली।

कहा जाता है बदले में नहरयाई के यदुवंशी सरदार ने नवाब के धमकी भरे पत्र में उल्टा यह लिखवाकर भिजवा दिया कि  " नवाब हमारी जागीर हमारे शौर्यवान पुरखो की जागीर है जिसे उन्होंने बाहुबल और तेगा के बल पर खड़ा किया था और यदुवंशी अहीर क्षत्रिय अपना शीश कभी नहीं झुकाते। तूने जो हमारी राजकन्याओं से विवाह कर हम यदुवंशी ठाकुरों की पगड़ी और स्वाभिमान को नीचा दिखाने की जुर्रत की है उसके बदले में हम तेरा शीश धड़ से अलग कर देंगे। अहीर क्षत्राणियां तेरा हरम स्विकार करने से पहले अग्निकुंड में कूद जाना पसंद करेंगी।"

इस प्रतिउत्तर से नवाब और भी ज़्यादा चिढ़ गया।

भोपाल नवाब ने सोचा कि अपने प्रतिशोध को पूरा करने का यह बहुत अच्छा अवसर है।

 यही सोच उसने अपने  सिपहसालारौं को आदेश दिया कि अपनी सभी तोपे और लाहो लश्कर के साथ नहरयाई को घेर लिया जाए और वहां से यदुवंशियों कि नस्ल का खात्मा कर दिया जाए।

हुक्म के अनुसार रातो रात लश्कर को नेहरयाई नदी घाट पर लगा दिया गया और सुबह नहरयाई की गड़ी पर तोपें चला के दो बुर्ज गिरा दिए गए और फिर संदेशा भिजवाया की राजकुमारी कमलावती और विमलावती दोनों को भोपाल नवाब से विवाह के लिए डोले में बिठा हमें सौंप दें या फिर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें।

सहसा हमले से नहरयाई के यदुवंशी संभल नहीं पा रहे थे लेकिन अपने आबरू और स्वाभिमान की रक्षा के लिए नवाब के सेनापति को उत्तर देते हुए गरजते हुए कहा " दुष्टों तुम चाहो जितना भी दम लगलो, हम मर जाएंगे लेकिन आखिरी सांस तक भी तुम्हे हमारी राजकन्याओं नहीं सौंपेंगे".

इस अचानक हमले से जब तक आसपास के यदुवंशी ठिकानों से मदद आती तब तक नवाब की तोपें गोले पे गोला दागती रही और नहरयाई गड़ी को ध्वस्त करने लगी जब यह देख दोनों राजकन्याओं ने जान लिया कि जब तक मदद आएगी तब तक हमारे कुटुंब परिवार जन और यह गड़ी बर्बाद हो चुकी होगी और इसका कारण हम दोनों ही हैं हमारी सुंदरता है नवाब के पास हम जाकर अपने रक्त और क्षत्रिय स्वाभिमान को लज्जित नहीं करेंगे लेकिन हां हम अपने शीश काटकर जरूर दे सकते हैं ताकि ये झगड़ा समाप्त हो जाए ।

उन दोनों राजकन्याओं ने अपने पितामहराज के सामने जाकर कहा " हे पितमहराज हम दोनों के ही कारण आज हमारा कुटुंब खत्म होने के कगार पर, हम दोनों उस नीच के पास जाकर यदुवंशियों के मान मर्यादा को अपमानित नहीं करेंगी लेकिन अपने कुटुम्ब कि रक्षा खातिर अपने अपने शीश उतार आपको पेश करेंगी , आप हमारे शीष उस नवाब के पास भिजवा देना एक सन्देश के साथ कि अहीर क्षत्राणियां हंसते हंसते मर जाना स्विकार करेंगी लेकिन अपने क्षत्रिय आबरू पर आंच नहीं आने देंगे।"

दोनों ने स्वयं का तेगा निकाला और अपने हाथों से अपने शीश काट थाल में रख दिए और नवाब के सिपहसालार के पास भिजवा दिए ।

उन कटे हुए शीशों को जब नवाब की सेना ने देखा तो पूरी सेना भयभीत हो गई ।सेना के नायकों ने युद्ध न करने की सलाह सिपहसलार को दे दी। सिपेहसालार ने सेना में विद्रोह की आशंका को मन में ध्यान रख अपने लश्कर को भोपाल रवाना कर दिया।

बलिदानी कमलावती और विमलावती इस जौहर के कारण जनमानस के मन में अमर हो गई ।

आज भी नेहरयाई गड़ी में इन दोनों के नाम के चबूतरे बने हुए हैं तथा इनके शौर्य को हमेशा हमेशा याद रखा जाएगा की इन दोनों में इतना साहस था जिसने अपने कुल के मान और मर्यादा की रक्षा की।


क्षत् से रक्षा करती है जो
वह क्षत्राणी कहलाती है
क्षत्राणी की गौरव गाथा
ग्रंथों में गायी जाती है ।

पौराणिक युग से ही उसने
यश पताका फहरायी है
गंगा – पार्वती सी हिमकन्या

जग कल्याणी कहलायी हैं

जय द्वारिकाधीश।    जय मां भवानी।        जय मां भारती

ठाकुर दलेल सिंह

ठाकुर दलेल सिंह








 महाराजा प्रहलाद दास के वंशज पुलईया नंदवंशीयों ने मध्य प्रदेश के विदिशा तक कई जागीरों को स्थापित किया जिसमे सेमलखेडी , खडोर, रामगढ़,थाना तला,नहरयाई,पट्टन, सहजाखेड़ी रामगढ़ , दुनातर घराने आदि प्रमुख हैं।

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जागाऔं के पास रखे दस्तावेज़ और वंशावली के अनुसार आज से लगभग 300 वर्ष पूर्व विदिशा के पट्टन में भगवान श्री कृष्ण की पीढ़ी के 151वे शासक राजा राव धुंधसाय सिंह का शासन था।

 ठाकुर श्री केसरी सिंह यादव के घर ही लगभग 1750 में ठाकुर दलेल सिंह का जन्म हुआ।

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प्रतापी ठाकुर दलेल सिंह का व्यक्तित्व काफ़ी आकर्षक था - इनका भीमकाय कद सात फीट, फौलादी चौड़ी छाती, रौबदार मूछें, सूर्य की भांति दमकता मुख एवम बुलंद आवाज़ इनके व्यक्तित्व में चार चाँद लगाते थे ।

ये इतने शूरवीर थे की 50 किलो की साँग हमेशा बाएं हाथ में रहती और आपका भीमकाय शरीर दुश्मनों में हमेशा दहशत भर दिया करता था ।

आपके नाम से ही दुश्मन सेना में खलबली मच जाया करती थी । आपने अपने तेगा के बल पर दुनातर गांव की सन् 1777 में स्थापना की और जागीर खड़ी की ।

वीर चन्द्रवंशज यदुवंशी क्षत्रिय ठाकुर सा दलेल सिंह जी ने जब दुनातर की जागीर स्थापित करी तब वहाँ के पड़ोस के ही जागीर के अग्नीवंशी पंवार कुल के शासक करन सिंह नाम का हुआ करता था जो ठाकुर श्री दलेल सिंह की बढ़ती कीर्ति से जलता था।

इतिहास गवाह रहा है की भारत के सभी क्षत्रिय कुलो में एकता का आभाव था और इसी एकता के अभाव के कारण मध्य युग में भारत को मूल्य चुकाना पड़ा।

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समय ने एक बार फिर वही पुराना इतिहास दोहराया और एक बार फिर चन्द्रवंशज यदुवंशी अहीर क्षत्रियो और अग्निवंशी क्षत्रियों में सम्प्रभुता के कारण घनघोर रण हुआ।

दोनों ओर की सेना एक दुसरे के सामने आ डटी।

यदुवंशी सेना का मोर्चे पर नेतृत्व कर रहे ठाकुर दलेल सिंह के भतीज कुंवर दौलत सिंह ने अपने छोटे से सैन्य दल के साथ ही अग्नि वंशियो के किले पर कब्जा कर लिया।

इस लड़ाई में इनके वीर भतीज कुँवर दौलत सिंह यदुवंशी रण खेत रहा।


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कुछ सालो के अंतराल से अपनी पराजय से तिलमिलाए अग्निवंशी राजा करण सिंह ने मुड़िया खेड़े के झोरे के पास झाड़ों में छिपा था।



पट्टन दरवार के रास्ते में अकेले देख करण सिंह ने अकेले ठाकुर दलेल सिंह जी को पिछे से वार कर उनकी गर्दन काट दी।

लेकिन द्वारिकाधीश की नस्ल के शासक ठाकुर दलेल सिंह की थम्नियो में बहते शाही रक्त का प्रताप तो देखिये कि मस्तक कटने के बाद भी करन सिंह के साथ आय हुए सभी विश्वास घातीयों को वीरवर ठाकुर दलेल सिंह जी के धड़ ने हाथों में शमशीर ले मौत के घाट उतार दिया ।

यह मंज़र देख राजा करण सिंह भाग गया।

युद्ध के पश्चात ठाकुर श्री दलेल सिंह के धड़ ने छल से कटे उनके कटे शीश को हाथ में लेकर पट्टन दरवार में न जाकर के नजदीक तालाब किनारे आकर बैठ गए।

जहां पर आज भी इनकी याद में सम्मान स्वरुप भव्य चबूतरा बना हुआ है।

हालाँकि युद्ध के पश्चात भी काफी समय तक अग्निवंशी तथा यदुवंशी घरानों में आपसी खूनी संघर्ष चला लेकिन बाद में दोनों घरानों के विवाद सुलझ गये तथा दोनों घरानों में तबसे लेकर आजतक गज़ब की एकता और भाईचारा बरकरार है।

हर वर्ष यहाँ शहीद वीरवर ठाकुर श्री दलेल सिंह यदुवंशी की याद में श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाते हैं।

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शत शत नमन।


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जय द्वारिकाधीश

ठाकुर मर्दन सिंह

ठाकुर मर्दनसिंह यदुवंशी


















विदिशा जिले के पट्टन गांव ,जो कि अपने समय में स्वतंत्र जागीर हुआ करती थी के जागीरदार ठाकुर राम सिंह एवं हिंगोनी गांव के खमेरीयों की पुत्री मेंदाबाई कंवर के यहां भादो सुदी अमावस्या के दिन विक्रम संवत् 1805 की साल पट्टन की गड़ी में बालक मर्दन सिंह का जन्म हुआ ।
मर्दन सिंह जी की शस्त्र विद्या, शिक्षा दीक्षा के उपरांत हिंगोंनी के सरेले गोत्र की प्यार कंवर के साथ विवाह हुआ। प्यार कंवर बहुत ही धार्मिक स्त्री थी ।
ठाकुर राम सिंह जी की असमय मृत्यु हो जाने के कारण कुंवर मर्दन सिंह अपने पिता को बाजीराव पेशवा द्वारा दी गई राजेश्री रावत की पदवी धारण कर  सभी यदुवंशिय जंगी सरदारों की सरपरस्ती में  पट्टन की गद्दी पर आसीन हुए।
राजेश्री रावत ठाकुर मर्दन सिंह ने अपनी कुशल नीति से मराठों को कर चुका कर अपनी जागीर को स्वतंत्र बनाए रखा । आपकी कोई संतान न होने पर वृद्धावस्था में आपने अपने छोटे भाई अमन सिंह के पुत्र जवाहर सिंह (ज्यौध सिंह) को अंग्रेजों के विरुद्ध जाकर गोदी लिया ।
 ठाकुर मर्दन सिंह जी के विषय में क्षेत्र में कई कहानियां प्रचलित हैं।

देवता के रूप में भी ठाकुर मर्दन सिंह जी के नाम की दुहाई दी जाती थी।

होली  तथा बारिश के मौसम में ठाकुर मर्दन सिंह जी के शौर्य को बखान करती हुई कई फाग और राई गायन किये जाते है।
 जैसे कि।-

1.पट्टन के मर्दनसिंह दुल्हारे के हाथी बरी तरे झूलें।
2. पट्टन के मर्दनसिंह अहिरवाड़ा में एक बुंदेला ।
3. पवई धुरेरा के सब ही भले , मालय के दो चार।
 पट्टन को एक ही भलो , जै की नंगी चमके तलवार ।।
4.  पट्टन के मर्दन सिंह गढला लूटे रेन जिंदईया।
5. पार्वती के जा लगे और बेतवा के बा लगे ।
   रहो न कोई सूरमा जै मर्दनसिंह से जा लडे ।।




1.ठाकुर मर्दन सिंह की मौजूदगी में लोहार की भट्टी में ताप नहीं आता था ।

2.ग्वालियर महाराज की दुहाई पर कुत्ता  'बकरे का कटा हुआ सर' पट्टन ले आना।

3.
आप के दरबार में कोई भी फरियादी निराश हो कर वापस नहीं जाता था।
 इसी के कारण हमेशा आसपास के राज्यों में चर्चित रहते थे।

आपने कई लड़ाइयां सिर्फ फरियादियों के कहने पर लड़ी।

4.समकालीन जागीरदारों के मान रक्षा के लिए नवाब को थूका थूक चटबाना।

 5.अपने पूर्वजों की तरह आपने भी संवत् 1903 की साल गढी का जीर्णोद्धार कराया,
राम जानकी का मंदिर बनवाया ,
बाग लगाए, 
समाज सेवा के लिए सड़क निर्माण कराई। 
कुए खुद बाये।

6.अंग्रेजो के खिलाफ समकालीन जागीरदारों को एक करना ।

7.झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के पक्ष में अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चाबंदी की
जिसके कारण स्वतंत्र पट्टन जागीर को ग्वालियर राज्य में मिला दिया गया। एवं संवत् 1916 (1858 ई.) की साल मां भारती का लाल , कमजोरौं की ताकत , यदुवंशियों के गौरव , स्वर्ग के वासी हो गये ।


जय द्वारिकाधीश।             जय मां भारती।           जय हिन्द

पुलहिया अभीर यदुवंशी ठाकुर यादव

पुलहिया आभीयर नन्दवंशी यादव
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पंचरंगा ध्वज
















चारण-भाटों एवं इतिहास की तारीख़ों के अनुसार पुलहिया गोत्रीय नन्दवंशी अहीर क्षत्रियों का ख़ानदानी सिलसिला शुरू होता है  महाराजा राव प्रहलाद दास  नन्दवंशी से ।

इस ख़ानदान के पुरोहितों व जागाऔं के पास रखी पौथियों  एवं वंशावली के अनुसार "पुलहिया" नंदवंशी क्षत्रियों के आदिपुरुष  महाराजा राव प्रहलाद दास नन्दवंशी भगवान द्वारिकाधीश के 7वी पीढ़ी के शासक थे।





पुराणों में उल्लेख के अनुसार वसुदेव जी के चचेरे भाई बाबा नंद जो गोकुल के जागीरदार थे उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं था। बाबा नंद की मात्र एक कन्या आदिशक्ति माँ योगेश्वरी थीं जो भगवान कृष्ण की बहन थीं एवं कलांतर में समस्त यदुवंश की कुलदेवी कहलाईं।





अत: भगवान श्रीकृष्ण ने अपने काका (पालक पिता) श्री बाबा नंद के वंश को आगे बड़ाने के लिए अपने पुत्र महानंद से बाबा नंद का वंश आगे बड़ाया जिनके वंशज महाराजा राव प्रहलाद दास थे।

अत: पुलईया (पुलहिया) गोत्र प्राय: विशुद्ध वृष्णि वंशी यदुवंशी हैं। परंतु नन्द बाबा के  यहां रहने एवं लोकिक रीति (पीडां त्योहार मनाने) के आधार पर नंदवंशी भी कहे जाते हैं। जिनका अर्थ समान है क्योंकि वसुदेव जी और नंद जी दोनों ही वृष्णि वंशी यादव थे और चचेरे भाई थे।


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महाराजा  राव प्रहलाद दास ने मथुरा में बसे सगोत्रीय भाईबंदों के संग मथूरा के पास मधुवन  में गढप्रहलादखेड़ा की नींव रखी और वहां पर एक किले नुमा गढ़ी का निर्माण करवाया, तालाव खुदवाया, साथ ही एक राधा-कृष्ण के मंदिर का निर्माण किया जहां पर एक पुजारी को नियुक्त किया और उस पुजारी को अपनी जीविका चलाने के लिए 52 बीघा जमीन दीl

पुजारी जी का नाम पंडित गिरधारी दास बताया गया है।



 पुलहिया खानदान जिनके ठिकाने आज भी मध्य प्रदेश (बुंदेलखंड ) एवं आस पास के क्षेत्रों में आबाद हैं।


महाराजा राव प्रहलाद दास के 133वी पीढ़ी के राजा राव महासिंह और राव हरिसिंह यदुवंशी ने वहां से माइग्रेट कर सन् 1247वी में सेमल खेड़ी( अशोकनगर,सिरोंज) में गढी बनाई एवं यह जागीर 48 गांव की थी।  (राजा राव महा सिंह जी के पिडियो का इतिहास लिखित रूप से अभी उपलब्ध नहीं हो सका है )


147वी पीढी के राव भोले सिंह, राव मोले सिंह ने बबराना को आबाद किया और गढ़ी बनाई।

राव मथुरामल सिंह यदुवंशी ने रामगढ़ खरोड़, शिवपुरी के पास जाकर वहां गढ़ी का निर्माण किया। राव मनोहरदास ने रामगढ विजय किया।







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महाराजा राव प्रहलाद दास जी की  149वी पीडी में जन्मे राव महा सिंह जी ने विक्रम संवत 1603 की साल थाने तला पर विजय पाई  आकर गढी बनाई।







और आस-पास कई गांव बसायै।
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150वी पीढ़ी के राव राजा बुद्धसिंह  ने संवत् 1618 की साल नेहरयाई पर गढ़ी बनाई।






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पट्टन जागीर




एक मरतबा कुछ पुया यदुवंशी शिकार खेलने के दौरान राज्य की सीमा से दूर पट्टन नामक स्थान पर आ पहूंचे।

 जहां पर उन्होंने एक अचंभा देखा की खरगोश और हिरण भयभीत नहीं हो रहे थे उन्हें देख कर भाग भी नहीं रहे थे।

 यह देख कर उन्हें ऐसा लगा यह जीत का खेरा है यह वीर भूमि है क्यों ना यहीं पर डेरा डाला जाए ।

तब पुलैया अहीर ठाकुरों ने पट्टन जागीर के दिया और हंसपुरिया राजपूतों एवं कनवजिया ब्रह्मणो  के पास संदेशा भेजवाया गढ़ी खाली करने को।

गरासियौ, राजपूतों ने इस बात से इनकार कर दिया  उसके बाद दोनों ओर से पट्टन के खेरे में सेना एकत्रित हो गई ।

राजा राव  धुंधसहायसिंह यदुवंशी ने सजातियों की 1500 पैदल और 200 बंदूकों की सेना ने विक्रम संवत 1711 की साल  गरासिया, राजपूत दीया हंसपूरिया ,कंवजियों   को हरा कर अपनी ध्वजा पट्टन पर लहरा दी ।

अहिर ठाकुरों ने जब पट्टन पर धावा बोला था।
गरासिया की तागत को तलवारों पे तोला था।।
तेगा फरसा खड़क उठे, चमक उठी तलवारें।
धाये धाये बोले बंदूकें, वीर नन्द के ललकारें।।

गढी पर पुलईया यदुवंशी ठाकुरों की पताका फ़हरा दी।

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पट्टन के जागीरदार
राजा राव धुंधसहाय सिंह
ठाकुर मोहनसिंह
ठाकुर अखेसिंंह
ठाकुर राम सिंह
ठाकुर मर्दन सिंह
ठाकुर जवाहर सिंह


पट्टन जागीर के सबसे आखरी प्रभावशाली जोरावर जागीरदार ठाकुर मर्दन सिंह यदुवंशी थे।







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सेहजाखेडी-रामगढ जागीर


 ठाकुर हैवत सिंह ने विक्रम संवत 1845 मैं बाय नदी के तट पर सेहजाखेड़ी में पुलईया  ठाकुरों ने नई गढ़ी का निर्माण करवाया ।

घड़ी के निर्माण के साथ एक रोचक कथा जुड़ी हुई है।
पट्टन में गड़ी निर्माण के लिए यज्ञ किया गया। यदुवंशी  बैल को ही पवित्र मानते हैं अतः पुजा के बाद बैल को वहां से छोड़ा गया । यह बैल जहां भी बैठ जाएगा वहीं पर गड़ी निर्माण की जाएगी ।  बेल पट्टन से चल दिया और बाह नदी को पार कर पास के खेरे पर सहज में बैठ जाने के कारण उस स्थान को सहजाखेड़ी नाम दिया गया।

ये भव्य गढी बायै नदी में  विक्रम संवत 1923 में आई भयंकर बाड में नष्ट हो गई।

इसके बाद अतिरिक्त दो गांव बसाये सहजाखेड़ी व रामगढ़।

सोने के घिसाना थे जिनके, पीकदान थे चांदी के।
चांदी मूठ लगी तलवारें, स्वर्ण दीप दिवाली के।।

 सेहजाखेडी-रामगढ़ जागीरदारी के सबसे आखरी जोरावर जागीरदार ठाकुर रंजीत सिंह यदुवंशी थे।



 सेहजाखेड़ी-रामगढ के जागीरदार

ठाकुर हैवत सिंह
ठाकुर निर्भय सिंह
ठाकुर मोती सिंह
ठाकुर खुमान सिंह
ठाकुर रंजीत सिंह
ठाकुर हरिसिंह

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धौवीखेडा जमीदारी
राजधर्म को निभाते हुए प्राण तक निछावर करने वाले ठाकुर साहब एवं आपने सतित्व  धर्म पर प्राण निछावर करने वाली ठकुराइन जी की धोवीखेडा जमीदारी















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थाना जागीर
ठाकुर रूप सिंह ठाकुर लाल सिंह जी ने विक्रम संवत् 1735 की साल थाने पठार पर जागीर स्थापित की।

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दुनातर जागीर
ठाकुर दलेल सिंह जी ने विक्रम संवत 1835 में दुनातर जागीर की स्थापना की।









!! जय द्वारिकाधीश !!