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जागाऔं के पास रखे दस्तावेज़ और वंशावली के अनुसार आज से लगभग 300 वर्ष पूर्व विदिशा के पट्टन में भगवान श्री कृष्ण की पीढ़ी के 151वे शासक राजा राव धुंधसाय सिंह का शासन था।
ठाकुर श्री केसरी सिंह यादव के घर ही लगभग 1750 में ठाकुर दलेल सिंह का जन्म हुआ।
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प्रतापी ठाकुर दलेल सिंह का व्यक्तित्व काफ़ी आकर्षक था - इनका भीमकाय कद सात फीट, फौलादी चौड़ी छाती, रौबदार मूछें, सूर्य की भांति दमकता मुख एवम बुलंद आवाज़ इनके व्यक्तित्व में चार चाँद लगाते थे ।
ये इतने शूरवीर थे की 50 किलो की साँग हमेशा बाएं हाथ में रहती और आपका भीमकाय शरीर दुश्मनों में हमेशा दहशत भर दिया करता था ।
आपके नाम से ही दुश्मन सेना में खलबली मच जाया करती थी । आपने अपने तेगा के बल पर दुनातर गांव की सन् 1777 में स्थापना की और जागीर खड़ी की ।
वीर चन्द्रवंशज यदुवंशी क्षत्रिय ठाकुर सा दलेल सिंह जी ने जब दुनातर की जागीर स्थापित करी तब वहाँ के पड़ोस के ही जागीर के अग्नीवंशी पंवार कुल के शासक करन सिंह नाम का हुआ करता था जो ठाकुर श्री दलेल सिंह की बढ़ती कीर्ति से जलता था।
इतिहास गवाह रहा है की भारत के सभी क्षत्रिय कुलो में एकता का आभाव था और इसी एकता के अभाव के कारण मध्य युग में भारत को मूल्य चुकाना पड़ा।
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समय ने एक बार फिर वही पुराना इतिहास दोहराया और एक बार फिर चन्द्रवंशज यदुवंशी अहीर क्षत्रियो और अग्निवंशी क्षत्रियों में सम्प्रभुता के कारण घनघोर रण हुआ।
दोनों ओर की सेना एक दुसरे के सामने आ डटी।
यदुवंशी सेना का मोर्चे पर नेतृत्व कर रहे ठाकुर दलेल सिंह के भतीज कुंवर दौलत सिंह ने अपने छोटे से सैन्य दल के साथ ही अग्नि वंशियो के किले पर कब्जा कर लिया।
इस लड़ाई में इनके वीर भतीज कुँवर दौलत सिंह यदुवंशी रण खेत रहा।
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कुछ सालो के अंतराल से अपनी पराजय से तिलमिलाए अग्निवंशी राजा करण सिंह ने मुड़िया खेड़े के झोरे के पास झाड़ों में छिपा था।
पट्टन दरवार के रास्ते में अकेले देख करण सिंह ने अकेले ठाकुर दलेल सिंह जी को पिछे से वार कर उनकी गर्दन काट दी।
लेकिन द्वारिकाधीश की नस्ल के शासक ठाकुर दलेल सिंह की थम्नियो में बहते शाही रक्त का प्रताप तो देखिये कि मस्तक कटने के बाद भी करन सिंह के साथ आय हुए सभी विश्वास घातीयों को वीरवर ठाकुर दलेल सिंह जी के धड़ ने हाथों में शमशीर ले मौत के घाट उतार दिया ।
यह मंज़र देख राजा करण सिंह भाग गया।
युद्ध के पश्चात ठाकुर श्री दलेल सिंह के धड़ ने छल से कटे उनके कटे शीश को हाथ में लेकर पट्टन दरवार में न जाकर के नजदीक तालाब किनारे आकर बैठ गए।
जहां पर आज भी इनकी याद में सम्मान स्वरुप भव्य चबूतरा बना हुआ है।
हालाँकि युद्ध के पश्चात भी काफी समय तक अग्निवंशी तथा यदुवंशी घरानों में आपसी खूनी संघर्ष चला लेकिन बाद में दोनों घरानों के विवाद सुलझ गये तथा दोनों घरानों में तबसे लेकर आजतक गज़ब की एकता और भाईचारा बरकरार है।
हर वर्ष यहाँ शहीद वीरवर ठाकुर श्री दलेल सिंह यदुवंशी की याद में श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाते हैं।
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शत शत नमन।
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जय द्वारिकाधीश



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