शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

पुलहिया अभीर यदुवंशी ठाकुर यादव

पुलहिया आभीयर नन्दवंशी यादव
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पंचरंगा ध्वज
















चारण-भाटों एवं इतिहास की तारीख़ों के अनुसार पुलहिया गोत्रीय नन्दवंशी अहीर क्षत्रियों का ख़ानदानी सिलसिला शुरू होता है  महाराजा राव प्रहलाद दास  नन्दवंशी से ।

इस ख़ानदान के पुरोहितों व जागाऔं के पास रखी पौथियों  एवं वंशावली के अनुसार "पुलहिया" नंदवंशी क्षत्रियों के आदिपुरुष  महाराजा राव प्रहलाद दास नन्दवंशी भगवान द्वारिकाधीश के 7वी पीढ़ी के शासक थे।





पुराणों में उल्लेख के अनुसार वसुदेव जी के चचेरे भाई बाबा नंद जो गोकुल के जागीरदार थे उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं था। बाबा नंद की मात्र एक कन्या आदिशक्ति माँ योगेश्वरी थीं जो भगवान कृष्ण की बहन थीं एवं कलांतर में समस्त यदुवंश की कुलदेवी कहलाईं।





अत: भगवान श्रीकृष्ण ने अपने काका (पालक पिता) श्री बाबा नंद के वंश को आगे बड़ाने के लिए अपने पुत्र महानंद से बाबा नंद का वंश आगे बड़ाया जिनके वंशज महाराजा राव प्रहलाद दास थे।

अत: पुलईया (पुलहिया) गोत्र प्राय: विशुद्ध वृष्णि वंशी यदुवंशी हैं। परंतु नन्द बाबा के  यहां रहने एवं लोकिक रीति (पीडां त्योहार मनाने) के आधार पर नंदवंशी भी कहे जाते हैं। जिनका अर्थ समान है क्योंकि वसुदेव जी और नंद जी दोनों ही वृष्णि वंशी यादव थे और चचेरे भाई थे।


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महाराजा  राव प्रहलाद दास ने मथुरा में बसे सगोत्रीय भाईबंदों के संग मथूरा के पास मधुवन  में गढप्रहलादखेड़ा की नींव रखी और वहां पर एक किले नुमा गढ़ी का निर्माण करवाया, तालाव खुदवाया, साथ ही एक राधा-कृष्ण के मंदिर का निर्माण किया जहां पर एक पुजारी को नियुक्त किया और उस पुजारी को अपनी जीविका चलाने के लिए 52 बीघा जमीन दीl

पुजारी जी का नाम पंडित गिरधारी दास बताया गया है।



 पुलहिया खानदान जिनके ठिकाने आज भी मध्य प्रदेश (बुंदेलखंड ) एवं आस पास के क्षेत्रों में आबाद हैं।


महाराजा राव प्रहलाद दास के 133वी पीढ़ी के राजा राव महासिंह और राव हरिसिंह यदुवंशी ने वहां से माइग्रेट कर सन् 1247वी में सेमल खेड़ी( अशोकनगर,सिरोंज) में गढी बनाई एवं यह जागीर 48 गांव की थी।  (राजा राव महा सिंह जी के पिडियो का इतिहास लिखित रूप से अभी उपलब्ध नहीं हो सका है )


147वी पीढी के राव भोले सिंह, राव मोले सिंह ने बबराना को आबाद किया और गढ़ी बनाई।

राव मथुरामल सिंह यदुवंशी ने रामगढ़ खरोड़, शिवपुरी के पास जाकर वहां गढ़ी का निर्माण किया। राव मनोहरदास ने रामगढ विजय किया।







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महाराजा राव प्रहलाद दास जी की  149वी पीडी में जन्मे राव महा सिंह जी ने विक्रम संवत 1603 की साल थाने तला पर विजय पाई  आकर गढी बनाई।







और आस-पास कई गांव बसायै।
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150वी पीढ़ी के राव राजा बुद्धसिंह  ने संवत् 1618 की साल नेहरयाई पर गढ़ी बनाई।






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पट्टन जागीर




एक मरतबा कुछ पुया यदुवंशी शिकार खेलने के दौरान राज्य की सीमा से दूर पट्टन नामक स्थान पर आ पहूंचे।

 जहां पर उन्होंने एक अचंभा देखा की खरगोश और हिरण भयभीत नहीं हो रहे थे उन्हें देख कर भाग भी नहीं रहे थे।

 यह देख कर उन्हें ऐसा लगा यह जीत का खेरा है यह वीर भूमि है क्यों ना यहीं पर डेरा डाला जाए ।

तब पुलैया अहीर ठाकुरों ने पट्टन जागीर के दिया और हंसपुरिया राजपूतों एवं कनवजिया ब्रह्मणो  के पास संदेशा भेजवाया गढ़ी खाली करने को।

गरासियौ, राजपूतों ने इस बात से इनकार कर दिया  उसके बाद दोनों ओर से पट्टन के खेरे में सेना एकत्रित हो गई ।

राजा राव  धुंधसहायसिंह यदुवंशी ने सजातियों की 1500 पैदल और 200 बंदूकों की सेना ने विक्रम संवत 1711 की साल  गरासिया, राजपूत दीया हंसपूरिया ,कंवजियों   को हरा कर अपनी ध्वजा पट्टन पर लहरा दी ।

अहिर ठाकुरों ने जब पट्टन पर धावा बोला था।
गरासिया की तागत को तलवारों पे तोला था।।
तेगा फरसा खड़क उठे, चमक उठी तलवारें।
धाये धाये बोले बंदूकें, वीर नन्द के ललकारें।।

गढी पर पुलईया यदुवंशी ठाकुरों की पताका फ़हरा दी।

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पट्टन के जागीरदार
राजा राव धुंधसहाय सिंह
ठाकुर मोहनसिंह
ठाकुर अखेसिंंह
ठाकुर राम सिंह
ठाकुर मर्दन सिंह
ठाकुर जवाहर सिंह


पट्टन जागीर के सबसे आखरी प्रभावशाली जोरावर जागीरदार ठाकुर मर्दन सिंह यदुवंशी थे।







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सेहजाखेडी-रामगढ जागीर


 ठाकुर हैवत सिंह ने विक्रम संवत 1845 मैं बाय नदी के तट पर सेहजाखेड़ी में पुलईया  ठाकुरों ने नई गढ़ी का निर्माण करवाया ।

घड़ी के निर्माण के साथ एक रोचक कथा जुड़ी हुई है।
पट्टन में गड़ी निर्माण के लिए यज्ञ किया गया। यदुवंशी  बैल को ही पवित्र मानते हैं अतः पुजा के बाद बैल को वहां से छोड़ा गया । यह बैल जहां भी बैठ जाएगा वहीं पर गड़ी निर्माण की जाएगी ।  बेल पट्टन से चल दिया और बाह नदी को पार कर पास के खेरे पर सहज में बैठ जाने के कारण उस स्थान को सहजाखेड़ी नाम दिया गया।

ये भव्य गढी बायै नदी में  विक्रम संवत 1923 में आई भयंकर बाड में नष्ट हो गई।

इसके बाद अतिरिक्त दो गांव बसाये सहजाखेड़ी व रामगढ़।

सोने के घिसाना थे जिनके, पीकदान थे चांदी के।
चांदी मूठ लगी तलवारें, स्वर्ण दीप दिवाली के।।

 सेहजाखेडी-रामगढ़ जागीरदारी के सबसे आखरी जोरावर जागीरदार ठाकुर रंजीत सिंह यदुवंशी थे।



 सेहजाखेड़ी-रामगढ के जागीरदार

ठाकुर हैवत सिंह
ठाकुर निर्भय सिंह
ठाकुर मोती सिंह
ठाकुर खुमान सिंह
ठाकुर रंजीत सिंह
ठाकुर हरिसिंह

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धौवीखेडा जमीदारी
राजधर्म को निभाते हुए प्राण तक निछावर करने वाले ठाकुर साहब एवं आपने सतित्व  धर्म पर प्राण निछावर करने वाली ठकुराइन जी की धोवीखेडा जमीदारी















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थाना जागीर
ठाकुर रूप सिंह ठाकुर लाल सिंह जी ने विक्रम संवत् 1735 की साल थाने पठार पर जागीर स्थापित की।

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दुनातर जागीर
ठाकुर दलेल सिंह जी ने विक्रम संवत 1835 में दुनातर जागीर की स्थापना की।









!! जय द्वारिकाधीश !!



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