ठाकुर पूरणमल सिंह यदुवंशी
अहिरवाड़ा मध्य भारत या आधुनिक मध्य प्रदेश में पार्वती और बेतवा नदियों के बीच स्थित एक ऐतिहासिक विशाल क्षेत्र है।
अहिरवाड़ा एक राजशाही राज्य था भगवान श्री कृष्ण के वंशज यदुवंशी अहीर क्षत्रिय राजाओं द्वारा शासित जो आज के भिलसा और झांसी शहरों के बीच स्थित था। इस राजवंश से जुड़े सिक्के तथा खण्डित अवस्था में शाही दुर्ग, महल की इमारते और मन्दिर आज भी मौजूद हैं।
रणधुरंधर राजा ठाकुर पूरण सिंह यदुवंशी इस राजवंश तथा राज्य के आखिरी शासक थे और मुस्लिम आक्रांता औरंगज़ेब के समकालीन थे ।
1700 में जब मालवा हिंदुआ सूर्य, अहीरवाड़ा नरेश यदुकुल अवतंस राजा ठाकुर पूरणमल सिंह राजगद्दी पर नशीन हुए तब उस समय क्रूर औरंगजेब द्वारा हिंदुओं पर सख्ती और ज़ुल्म बढ़ने लगे थे।
शिवाजी महाराज की तरह ही निडर ठाकुर पूरनमल सिंह ने औरंगजेब के आगे झुकना अपनी शान में हिमाकत और क्षत्रिय मर्यादा के विरुद्ध समझा इसीलिए औरंगजेब के ख़िलाफ़ बगावत का बिगुल फूंक दिया।
आये दिन अहीरवाड़ा के वीर हिंदु क्षत्रिय यदुवंशी अहीर, ब्राह्मण तथा रघुवंशी मुग़लिया फौज़ पर अपने राजा पूरणमल सिंह के नेतृत्व में हमला कर लूट खसूट करते थे।
औरंगजेब की जीवनी में उल्लेख है कि अहीरवाड़ा के वीरों से परेशान हो औरंगजेब ने अहीरवाड़ा से उठते विद्रोह को खत्म करने के लिए अपने ग़ुलाम तथा खिंची वंश के राजा दिलीप के साथ लगभग 50,000 की सँख्या में मुग़ल फौज़ को भेजा ।।
इतिहास गवाह रहा है कि हिंद के क्षत्रियों में शुरू से एकता का अभाव रहा है तथा इसी बात का फ़ायदा एक बार उठा औरंगजेब ने अहीरवाड़ा नरेश ठाकुर पूरनमल सिंह अहीर के कातर दुश्मन खिंची वंशी दिलीप को मोहरा बना विशाल मुग़ल सेना भेजी युद्ध हेतु।
दोनों तरफ़ की सेना के मध्य भयंकर युद्ध भी होता है लेकिन अंत मे गद्दार राजा दिलीप की गद्दारी के कारण राजा पूरनमल सिंह और उनकी अहीर सेना हार जाती है तथा अहीरवाड़ा का विशाल राज्य औरंगजेब अपने पालतू दिलीप को दे देता है ताकि भविष्य में हिंदुओं के तरफ़ से इस इलाके में कोई विद्रोह न हो।
1703 के बाद एक बार फ़िर राजा पूरनमलसिंह का वर्चस्व बढ़ता है और सूबे के वीर क्षत्रिय अहीरों, अफ़ग़ान पठानों, गरासियों, ब्राह्मणों की सेना के मदद से वे इलाकों को जीतते हुए औरंगजेब को चुनौती देते हुए एक पत्र में ये लिखवा भेजते हैं कि " औरंगजेब हमने अपने बाप दादाओ से ये राज्य पाया था। ये कोई तुमहारे बाप दादा की जागीर नही। हम यहाँ के बेताज बादशाह है और ये तुम्हारी पहुँच के बाहर। जब तक जीयेंगे आज़ाद जीयेंगे "।
1714 में फ़िर से औरंगजेब ने विद्रोह दबाने हेतु अपने वफ़ादार तथा क्षत्रिय कुल पर कलंक कहे जाने वाले जयपुर घराने के राजा जयसिंह के संग हज़ारो की तादाद में मुग़ल फौज़ भेजकर अहीरवाड़ा से चन्द्रवंशी क्षत्रीय अहीर शासको की मिलकियत खत्म करने का हुक्म दिया।
जयसिंह मुग़ल सेना लेकर चढ़ाई करदेता है।
भीषण युद्ध होता है लेकिन एक बार फ़िर जांबाज़ ठाकुर पूरनमल सिंह और उनकी सेना मुग़लिया सेना और जयसिंह को मार खदेड़ते हैं तथा सिरोंज पर नियंत्रण स्थापित कर लेते हैं।
अहीर देश (अहिरवाड़ा) अपने क्षत्रप ठाकुर पुरनमल के नेत्रत्व मेंमुग़लो को सबक सिखाने के लिए सिरोंज से कालाबाग के लिए सड़कों को बंद कर दिया और रानोड और इंदौर के अपने गढ़ों से मुग़ल बादशाहत को परेशान करना जारी रखा।
राजा जय सिंह एक बार फिर अप्रैल 1715 में सिरोंज पहुँच अफगान सेना को पराजित करता है।
परंतु जय सिंह की ये जीत ज्यादा दिन तक नहीं टिक पायी और नवंबर 1715 में ठाकुर पूरनमल सिंह जी ने मालपुर में नए सिरे से लूट-पाट शुरू कर दी।
यदुवंशी अहीर, अफगानी पठान, ब्राह्मण, गरासिया, भील तथा अन्य हिंदू राजशाही मालवा में चारों ओर से विद्रोह हेतु खड़े हो गए अपने क्षत्रप ठाकुर पूरनमल सिंह के नेतृत्व में।
स्थिति को नियंत्रित करने की मुग़ल सरकार की हर कोशिश नाकाम रही और राजा ठाकुर पूरनमल सिंह ने जीतेजी कभी औरंगजेब के आगे सर नही झुकाया।
अहीरवाड़ा नरेश ठाकुर पूरणमल सिंह परिवार सहित अपनी मातृभूमि की रक्षा करते करते वीरगति को प्राप्त हो गए ।
जिस तरह चित्तौड के महाराणा प्रताप ने जीवित रहते कभी भी मुगलों के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया । उसी प्रकार अहीरवाड़ा में ठाकुर पूरणमल सिंह जी ने भी जीवन रहते कभी भी मुगलों के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया और युद्ध करते-करते अपने देश अहीरवाड़ा की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों को निछावर कर दिया।
मालवा रत्न, हिंदुआ सूर्य अहीरवाडा नरेश ठाकुर पूरण सिंह को शत शत नमन।


Bhai.. 1700, 1703 to thik h pr 1714 me aurengzeb.. kaise order de sakta bhai .. kyuki aurengzeb to 1706 me hi mar(death) chuka tha..
जवाब देंहटाएं